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क़सस अल अन्बिया: हज़रत सुलैमान علیہ السلام | Solomon - Prophet Sulayman |

क़सस अल अन्बिया: पयाम्बर-ए ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल हज़रत सुलैमान عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُوَٱلسَّلَامُ -

क़सस अल अन्बिया: हज़रत सुलैमान عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ -

शुरू ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल के बा-बरकत नाम से जो बातिन ओ ज़ाहिर से ख़ूब वाक़िफ़ है -

दुरूद-ए ख़ुदावन्द बर तमाम मुअ़ज़्ज़िज़ क़ारईन. अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आ़लम आप मुअ़ज़्ज़िज़ीन को अज़ तह क़ल्ब अस्सलामु अ़लैकुम व ख़ुश आमदीद. मैं आप का मेज़बान, ज़ुलक़रनैन मुहम्मद सुलैमान और आप इस वक़्त मौजूद है, निज़ाम-ए आ़लम पर. क़ब्ल अज़ मुतालआ़ एक दफ़ा तिलावत-ए दुरूद बर ख़ातिम-ए अन्बिया ﷺ पेश करें कि ख़ुदावन्द-ए सुब्हान क़ारी पर 10 मर्तबा अपनी रहमतों का नुज़ूल फ़रमाता है -

بِسْمِ ٱللَّٰهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَـٰٓئِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ صَلُّواْ عَلَيْهِ وَسَلِّمُواْ تَسْلِيمًا

दुरूद व सलाम बर अन्बिया-ए ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल जनाब-ए दाऊद व सुलैमान नबी عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ‎ -

मोहतरम मुअ़ज़्ज़िज़ क़ारईन, सिलसिला-ए क़सस अल अन्बिया عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ में गुज़िश्ता क़िस्त हज़रत दाऊद عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ की ज़िन्दगी पर मुस्तक़िर थी व आज सिलसिला-ए क़सस अल अन्बिया عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ ही में हमारा मौज़ू पयाम्बर-ए ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ जनाब-ए सुलैमान عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ की ज़िन्दगी के हालात और हवादिस पर मुस्तक़िर है - 

(आया आप ने ये सीरीज़ ख़्वान्दन फ़रमाईं -)

जैसा कि अ़ज़ीज़ान-ए गरामी जानते हैं कि हज़रत दाऊद علیہ السلام के 19 फ़रज़न्दान थे और उन में जवान-तरीन फ़रज़न्द हज़रत सुलैमान علیہ السلام हैं. हज़रत दाऊद علیہ السلام की वफ़ात के बाद ख़ुदावन्द-ए करीम ने हज़रत सुलैमान علیہ السلام को अपने वालिद मोहतरम علیہ السلام का नबुव्वत और मल्कियत में ख़ल्फ़ बनाया. लिहाज़ा  हज़रत सुलैमान علیہ السلام महज़ नौ साला उम्र में अ़र्श-ए अल- क़ुद्स पर जलवा अफ़रोज़ हुए. हज़रत सुलैमान علیہ السلام को अल्लाह तआ़ला ने नबुव्वत और जहान-ए कुल पर मल्कियत अ़ता की. 

आप علیہ السلام का लश्कर तीन अजज़ा में मुन्क़सिम था. जिन में जिन्न इन्स व हैवानात ओ परिन्दगान शामिल थे. हवाएं आप علیہ السلام के ताइब थी. आप علیہ السلام हैवानात ओ परिन्दगान की ज़बान से भी बख़ूबी आशना थे. हत्ता कि आप علیہ السلام उन से बातें किया करते थे. एक दफ़ा हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने बताया कि मुर्ग़ سُبْحَانَ رَبِّيَ الأَعْلَى बोलते हैं. मेंढक سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ बोलते हैं. अ़र्श-ए सुलैमान علیہ السلام बड़ा अ़ज़ीम था और हवाएं आप علیہ السلام के अ़र्श को उड़ा कर ले जायां करती थीं.

लिहाज़ा अज़ वक़्त-ए फ़ज़्र ता ज़ुहर और अज़ वक़्त-ए ज़ुहर ता अ़स्र अ़र्श-ए सुलैमान علیہ السلام एक-एक माह तक की मुसाफ़त तय कर लिया करता था. बहरहाल एक दफ़ा हज़रत सुलैमान علیہ السلام अपने लश्कर के हमराह अल-क़ुद्स के दौरे पर निकले अचानक जब आप علیہ السلام को लश्कर ने मुस्कराते हुए पाया तो कहा कि आप علیہ السلام के हमराहान में से एक ने आप علیہ السلام के मुस्कराने की वजह तलब की तो आप علیہ السلام ने फ़रमाया यहाँ से 3 अम्याल की मुसाफ़त पर एक नम्ला है. 

जो अपने दीगर हमराहान से उनके बिलों में लौट जाने का कह रही है कि कहीं ऐसा ना हो अल्लाह के नबी علیہ السلام का लश्कर बे-ख़याली में तुम्हें कुचल दे. एक दफ़ा हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने तमाम परिन्दगान और हैवानात की मौजूदगी का जायज़ा लिया तो पाया की हुदहुद कहीं ग़ायब है. लिहाज़ा आप علیہ السلام ने परिन्दगान में किसी एक से हुदहुद की अदम मौजूदगी के बारे सवाल तलब फ़रमाया और कहा कि वो मुझ से बग़ैर इजाज़त लिए कहाँ चला गया मैं उस की इस ग़लती पर उस की सरज़निश करूंगा.

हाँ मगर वो कोई ख़बर-ए ख़ूब के साथ मेरे हुज़ूर पेश हो तो मैं उसकी ये ग़लती दर-गुज़र कर दूंगा. तो चूंका हुदहुद को इल्म था कि वो बग़ैर इजाज़त तलब किये ही कहीं चला गया तो अब उस से इसका हिसाब लिया जायगा. बहरहाल हुदहुद, बारगाह-ए सुलैमानी में आया तो उसने इज्ज़ ज़ाहिर किया. और अपने परों को ज़मीन पर फैला दिया और यूं अपने परों को घसीटते हुए आप علیہ السلام के हुज़ूर पेश हुआ. हज़रत सुलैमान علیہ السلام उस की ये आ़जिज़ी देख कर मुस्कराने लगे और उसे मआ़फ़ कर दिया.

हुदहुद की ख़ता दर-गुज़र फ़रमा देने का सबब-ए दोम ये था कि वो अपने वालिदैन का मुख़्लिस फ़रज़न्द था. वो उस वक़्त तक अपनी ग़िज़ा नहीं खाता था. जब तक कि अपने वालिदैन को ना खिला दे. सबब-ए सोम ये था कि वो एक ख़बर-ए ख़ूब लेकर हाज़िर हुआ था. हुदहुद ने हज़रत सुलैमान علیہ السلام से अर्ज़ किया, मैं उड़ता हुआ शाम से यमन चला गया था. वहाँ उसने देखा कि यमन पर एक औ़रत हुकूमत करती थी. उस के ज़ेर-ए सरपरस्त अ़ज़ीम व कबीर सरदारान काम किया करते थे. 

मरदम-ए यमन उसे मलका-ए सबा कहकर पुकारते थे. वो औ़रत निहायत ही ज़हीन ओ फ़तीन है उसका नाम बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا है. मगर मरदम-ए यमन ख़ुर्शीद-परस्त और आतिश-परस्त हैं लिहाज़ा हुदहुद को वहाँ का ये हाल देखकर अच्छा नहीं लगा. वहाँ मैं अ़र्श-ए अ़ज़ीम देखकर आया हूँ जो उस क़स्र के सात कमरों में मुक़फ़्फ़ल है. उसी पर मलका-ए सबा जलवा अफ़रोज़ हुवा करती हैं और उसी पर इस्तहारात फ़रमायां करती हैं. मैंने आज से क़ब्ल ऐसा अ़र्श-ए अ़ज़ीम कहीं नहीं देखा. 

हुदहुद से हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने फ़रमाया कि उस तक मेरा पैग़ाम पहुंचाओ लिहाज़ा हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने ब-नाम-ए इलाही आग़ाज़-ए ख़त किया और तहरीर किया की शिर्क से बाज़ आओ और ख़ालिक़-ए हक़ीक़ी और उसके पयाम्बर पर ईमान ले आओ ब-सूरत-ए दीगर मैं तुम से ऐलान-ए जंग करता हूँ.  लिहाज़ा हुदहुद अपने मुँह में पैग़ाम-ए सुलैमानी लेकर जानिब-ए मुल्क-ए यमन रवाना हुआ. उस वक़्त मलका-ए सबा जनाब-ए बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا सात कमरों में मुक़फ़्फ़ल अपने अ़र्श-ए अ़ज़ीम पर सो रहीं थीं. 

लिहाज़ा हुदहुद रौशन-दान से मलका-ए सबा के कमरे में दाख़िल हुआ. मगर मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا अपनी नींद से बेदार हो चुकीं थीं फिर भी हुदहुद ने मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا के सीने में ख़त डाला. लिहाज़ा मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا ने उस ख़त को पढ़ा तो कहा कि मुझे किसी अ़ज़ीम शख़्स ने पयाम भेजा है. मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا ने अपनी ज़हानत का इज़हार करते हुए अपने तमाम सरदारान को जमाअ़् किया और उन से कहा कि मुझे एक पयाम-ए ईमान वसूल हुआ है. 

कातिब-ए रिसालत ने लिखा है कि वो अल्लाह का नबी है और मुझे उस ने दावत-ए तौहीद दी है. ब-सूरत-ए दीगर वो हम से जंग करेगा. मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا के सरदारान ने कहा कि आप जो हुक्म सादिर करेंगी हमें क़ुबूल है. लिहाज़ा मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا ने कहा कि मैं उन से मफ़ाहमत कर लेना चाहती हूँ मगर इस से क़ब्ल मैं उस मुरसल-ए रिसालत का इम्तेहान लेना चाहती हूँ. लिहाज़ा मैं उसे ख़ूब हदाया भेजना चाहती हूँ अगर वो इन से राज़ी हो जाये तो हम पर ये वाज़ेह हो जायगा कि उस ने पयाम्बरी का झूठा दवा किया है.

लेकिन अगर वो इन तहाईफ़ को लौटा देगा तो हम उस की अताअ़त कर लेंगे. लिहाज़ा मलका-ए सबा ने हज़रत सलैमान علیہ السلام को हदियतन मुश्क ओ रेशम हीरे-जवाहरात और बा-अ़दाद कबीरा ग़ुलाम ओ कनीज़ भिजवाए और कहा कि हम आप علیہ السلام से मफ़ाहमत के ख़्वाहां हैं लिहाज़ा हदाया क़ुबूल करें. हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने मलका-ए सबा के भेजे गए बेश-क़ीमती हदाया को मुस्तरद करते हुए जवाबी ख़त तहरीर किया और फ़रमाया कि मुझ पर ख़ुदावन्द-ए करीम ने बड़े एहसानात और इनायात कीं हैं.

जिसके लिए मैं अपने रब का शुक्रगुज़ार हूँ और मुझे इनकी कोई ज़रुरत नहीं. लिहाज़ा अब जंग के लिए आमादा हो जाओ. जब मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا तक ये पयाम आया तो वो फ़ौरन बारगाह-ए सुलैमानी में हाज़िर होने पर आमादा हुई. अब अ़र्ज़-ए क़ुद्स से मलका-ए बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا चंद ही अम्याल की मुसाफ़त पर रह गयीं थीं कि जनाब-ए सुलैमान علیہ السلام को ख़याल आया कि क्यों ना मलका-ए सबा की ज़हानत का इम्तिहान लिया जाये? 

लिहाज़ा हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने अपने दरबरयान से फ़रमाया कि मेरे हुज़ूर कौन मलका-ए बिल्क़ीस का अ़र्श-ए अ़ज़ीम लाकर पेश करेगा? महफ़िल में मौजूद एक जिन्न ने हज़रत सुलैमान علیہ السلام से कहा कि मैं अज़ क़ब्ल-ए इख़्तताम-ए महफ़िल अ़र्श-ए बिल्क़ीस आप علیہ السلام के हुज़ूर पेश कर दूंगा. आप علیہ السلام ने फ़रमाया कि मुझे ज़्यादा ताख़ीर गवारा नहीं लिहाज़ा आप علیہ السلام के असहाब में से एक सहाबा, जिनका नाम हज़रत आसफ़ इब्न बरख़िया था.

आप علیہ السلام से अर्ज़ किया कि मैं अ़र्श-ए बिल्क़ीस पलक झपकने से पहले आप علیہ السلام के जुलू-ए दीद पेश कर दूंगा अगरचे हज़रत आसफ़ इब्न बरख़िया ने पूछा भी नहीं, अ़र्श-ए बिल्क़ीस आख़िर है कहाँ? बहरहाल हज़रत आसफ़ इब्न बरख़िया ने अ़र्श-ए बिल्क़ीस पेश किया. हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने फ़रमाया, बेशक ये मेरे रब का फ़ज़्ल है. अगरचे हज़रत सुलैमान علیہ السلام ये काम बज़ात-ए ख़ुद भी कर सकते थे मगर आप ने अपने ग़ुलाम से ये काम करवाके उन्हें बता दिया कि नबी के ग़ुलाम की शान क्या होती है?

जो लोग औलिया-ए इलाही की शान में ग़ुस्ताख़ियां करते हैं और अन्बिया व औलिया अल्लाह को नऊज़ु बिल्लाह मुर्दा कहते हैं या अपनी ही तरह एक आ़म इन्सान जानते हैं, कलाम-ए इलाही में तहरीर हज़रत सुलैमान علیہ السلام ही के इन क़सास से नसीहत लें और अन्बिया व औलिया अल्लाह की शान में ग़ुस्ताख़ियां करने से बाज़ आएं. बहरहाल जब अ़र्श-ए बिल्क़ीस हज़रत सुलैमान علیہ السلام के हुज़ूर पेश किया गया तो आप علیہ السلام ने फ़रमाया कि अ़र्श-ए बिल्क़ीस में कुछ तब्दीलियां कर दें कि मलका- ए सबा की ज़हानत का जायज़ा लिया जाए.

और अज़ क़ब्ल-ए आमद-ए मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا आप علیہ السلام ने फ़रमाया कि जिस क़स्र में मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا रहती है उस से भी बेहतरीन क़स्र की तामीर की जाये. लिहाज़ा आप علیہ السلام ने शीश महल की तामीर करवाई. हत्ता कि ज़मीन भी शीशे की बनवाई उस में पानी भर कर मछलियां डाल दी गयीं. 

हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने निहायत ही बेहतरीन अंदाज़ में मलका-ए सबा का शाहाना और पयाम्बराना इस्तक़बाल किया. मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا आप علیہ السلام से बहुत मुतासिर हुई. हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने मलका-ए सबा से फ़रमाया तुम्हें अपने अ़र्श-ए अ़ज़ीम बड़ा ही फ़ख़्र है इस तख़्त के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है? अगरचे अ़र्श-ए बिल्क़ीस में तब्दीलियां कर दी गयीं थीं और मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا अपने अ़र्श-ए अ़ज़ीम को कमरों में मुक़फ़्फ़ल करके आयी थी.

फिर भी मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا ने अपने अ़र्श-ए अ़ज़ीम की शनाख़्त कर ली. और कहा कि शायद ये तख़्त मेरा ही है. हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने फ़रमाया, आप का तख़्त मुन्तज़िर है, तशरीफ़ लाएं तो लिहाज़ा जनाब-ए बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا ने जैसे ही क़दम आगे करना चाहे कि ना-गहानी निगाहें ज़मीन पर गिरी. पाया कि नीचे पानी है जिस में मछलियां तैर रहीं हैं. लिहाज़ा फ़ौरन अपना लिबास समेट लिया. जनाब-ए सुलैमान علیہ السلام ने मुस्कराकर कहा ये दरया नहीं, शीशा है. हज़रत बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا शर्मा गयीं. 

बहरहाल मलका बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا अपने अ़र्श-ए अ़ज़ीम पर जलवा अफ़रोज़ हुईं और हज़रत सुलैमान علیہ السلام पर ईमान ले आईं. आप علیہ السلام का निकाह हज़रत बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا से हो गया. ख़ुदावन्द-ए सुब्हान ने आप علیہ السلام को हज़रत बिल्क़ीस سلام اللہ علیہا से औलाद भी अ़ता फ़रमाई. हज़रत सुलैमान علیہ السلام ने अपनी हयात-ए मुबारका के अय्याम-ए आख़िर में बैत अल मुक़द्दस की बाज़साज़ी का क़सद फ़रमाया. लिहाज़ा ख़ुदावन्द-ए यक्ता ने जिन्नात ओ शयातीन को आप علیہ السلام के हाथों मुसख़र कर दिया .

आप علیہ السلام ने जिन्नात को हुक्म दिया कि दरया में गोते लगाकर मोती तलाश लाएं और बैत अल मुक़द्दस के कार-ए तअ़्मीराती का आग़ाज़ करें. लिहाज़ा आप علیہ السلام के हुक्म पर आग़ाज़-ए कार हुआ और बस थोड़ा ही काम बाक़ी रह गया था कि आप علیہ السلام का वक़्त-ए विसाल क़रीब आ गया. आप علیہ السلام अपने अ़सा मुबारक के सहारे खड़े रहते और जिन्नात आप علیہ السلام के तहत-ए नज़र कार-ए तअ़्मीराती जारी रखते. इसी हालत में आप علیہ السلام की रूह क़ब्ज़ कर ली गयी.

और मुसलसल 1 साल तक आप علیہ السلام इसी शान से खड़े रहे और आप علیہ السلام के तहत-ए नज़र शयातीन ने भी अपना काम बग़ैर तवक़्क़ुफ़ जारी रखा. और सारा पस मान्दा काम एक ही साल में मुकम्मल हो गया तब ख़ुदावन्द-ए करीम ने दीमक को हुक्म दिया कि अ़सा-ए सुलैमान علیہ السلام को खा ले हत्ता कि ग़ूल-ए दीमक ने अ़सा-ए सुलैमान علیہ السلام को पूरा खा लिया और जनाब-ए सुलैमान علیہ السلام नीचे आ गिरे. और आप علیہ السلام के विसाल की ख़बर भी तभी हुई जब आप علیہ السلام ज़मीन पर गिरे.
 
इस तरह आप علیہ السلام का 60 साला उम्र में विसाल हुआ.

फ़िल-वक़्त आज की माअ़लूमात का हम यहीं इख़्तेताम करते हैं. सिलसिला-ए क़सस अल अन्बिया में हज़रत सुलैमान علیہ السلام के हवादिस-ए ज़िन्दगी से मुतअ़्ल्लिक़ ये अव्वल ओ आख़िरी क़िस्त है. लिहाज़ा क़िस्त-ए क़ादिम, हज़रत यूनुस علیہ السلام की ज़िन्दगी पर मुस्तअ़्मिल होगी जिस की अशाअ़त अज़ जानिब मरदम-ए निज़ाम-ए आलम आज से 6 रोज़ बाअ़्द (तारीख़ - 13/November/2022 की शब 20:00 बजे) होगी. 

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