
क़स्सास उल अनबिया: हज़रत-ए यूसुफ़ عليه سلام - आख़िरी क़िस्त
क़स्सास उल अनबिया: हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम

शुरू ख़ुदावंद-ए सुब्हान के बा-बरकत नाम से जो दिलों का मालिक है और जो दिलों के राज़ बख़ूबी जानता है-
दुरूद ओ सलाम बर तमाम मुअज़्ज़िज़ क़ारईन ओ ज़ायरीन, अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम आप मुअज़्ज़िज़ीन को मुहब्बतों भरा अस्सलामु अ़लैकुम व ख़ुश आमदीद, मैं आपका मेज़बान ज़ुलक़रनैन मुहम्मद सुलैमान और आप इस वक़्त मेरे साथ मौजूद हैं निज़ाम-ए आलम पर-
बक़ब्ल-ए मुताअला तमाम ज़ायरीन ओ क़ारईन से गुज़ारिश पेश है की आज के इस मज़मून का मुताअला भी मस्ल-ए हमेशा दुरूद-ए इब्रहीम के साथ ही शुरू करें. एक बार दरूद पढ़ लेने से ख़ुदावंद-ए मतआल क़ारी पर 10 मर्तबा अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमाता है-
بسم الله الرحمن الرحيم- - اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ،
- - اللَّهُمَّ بَارِكَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَ ا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
- - اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ،
- - اللَّهُمَّ بَارِكَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَ ا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
दुरूद ओ सलाम बर ख़िताम अल अनबिया ओ मुरसलीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम व दुरूद ओ सलाम बर नबी-ए ख़ुदावंद-ए सुब्हान जनाब-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ (अलैहिस्सलातुवस्सलाम):
हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम - क़िस्त नं.21
क़िस्त नं 20 में इन वाक़ेआत से आशना कराया गया था की किस तरह हज़रत यूसुफ़ की जानिब हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम एक ख़त रवाना करते हैं, जिसमें आप अलैहिस्सलाम हज़रत यूसुफ़ से बिनयामीन को लौटा देने की दरख़्वास्त करते हैं और जब बनी इसराईल हज़रत यूसुफ़ के पास ख़त लाते हैं तो बिलआख़िर उन्हें बता दिया जाता है की अज़ीज़-ए मिस्र ही यूसुफ़ हैं. और आज क़िस्त नं 21 में उससे आगे के हालात आप मुअज़्ज़िज़ीन के मुक़ाबिल बयान किये जाएंगे.
यहूदा ने कहा, चूंकि मैं ही यूसुफ़ का वो ख़ून आलूद क़मीज़ में बाबा के पास लेकर गया था लिहाज़ा ये शिफ़ा बख़्श क़मीज़ भी में ही ले जाकर दूंगा. लिहाज़ा यहूदा हज़रत यूसुफ़ का दिया गया वो शिफ़ा बख़्श क़मीज़ शाम की जानिब लेकर रवाना होते हैं, तो शाम में हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम अपने पोतों से कह रहे थे की मुझे मेरे यूसुफ़ की ख़ुश्बू आ रही है, पोते कहते हैं की दादा जान हमारे बाबा जान तो कहते हैं. की यूसुफ़ को भेड़िये ने खा लिया था तो यूसुफ़ दोबारा ज़िंदा तो नहीं हो सकता ना?
अगर तुम मुझे ज़ईफ़ी की वजह से ये न समझो की मैं सठिया गया हूँ तो यक़ीन कर लो, मुझे मेरे यूसुफ़ की ख़ुश्बू आ रही है. बिलआख़िर यहूदा क़मीज़ लेकर शाम आता है और हज़रत याक़ूब की आँखों पे रख देता है और हुक्म-ए इलाही से आप अलैहिस्सलाम को दोबारा बीनाई मिल जाती है. यहूदा ने हज़रत याक़ूब को बशारत दी की बाबा जान आपका यूसुफ़ भी मिल गया और बिनयामीन भी मिल गया और आपका यूसुफ़ ही अज़ीज़-ए मिस्र है. हज़रत याक़ूब कहते हैं की उसकी बादशाहत का मैं क्या करूँ?
ये बताओ, वो मेरे मज़हब पर है या नहीं? यहूदा ने कहा बाबा अल्लाह ने उस पर बड़ा करम किया है, बादशाहत के साथ ही उसे नबुव्वत और रिसालत से भी नवाज़ा है. हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम और उनके तमाम अहले ख़ाना मिस्र की जानिब रवाना हुए. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने तमाम लश्कर-ए मिस्र को अपने वालिद-ए मोहतरम हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के इस्तक़बाल के लिए रवाना किया. हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के लिए बेहतरीन मख़सूस क़िस्म की सवारी भेजी. बहरहाल आप अलैहिस्सलाम उस सवारी पर बैठकर आये.
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने 3 लाख का लश्कर आरास्ता करके मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर खड़ा किया, अपने वालिद-ए मोहतरम के ख़ुसूसी इस्तक़बाल के लिए. हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने शाम से रवाना होने से क़ब्ल ग़ुस्ल फ़रमाया था और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का भेजा गया मख़सूस लिबास आप अलैहिस्सलाम ने ग़ुस्ल के बाद ज़ेब-ए तन किया था. हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम को हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने 30 हज़ार के लश्कर के जुलू में मिस्र में दाख़िल किया.
ऐसा अज़ीमो शान माहौल देखकर आसमान में मलाइका ने अल्लाह से अर्ज़ किया ऐ मौला! जब तूने यूसुफ़ को याक़ूब से जुदा किया था तो यूसुफ़ की जुदाई पर याक़ूब के हमराह हमने भी अश्क बहाये और उसके ग़म में शिरकत की. अब हमें इजाज़त दे की हम बाप और बेटे की 50 साल के बाद, दोबारा मुलाक़ात का मंज़र देखें और उनकी ख़ुशी में शिरकत करें. बहरहाल हज़रत याक़ूब ने कहा की देखा, मेरे बेटे ने कैसी अज़मत, शान ओ शौक़त पायी है. मैं ना कहता था?
की अल्लाह की जो शानें मैं जनता हूँ, तुम उनसे नावाक़िफ़ और बेख़बर हो. बेशक़ मेरे रब का वादा सच्चा होता है, जब यूसुफ़ को मुझसे मेरा रब जुदा कर रहा था तो उसने मुझसे वादा किया था और मैंने भी यूसुफ़ को अपने रब की अमान में दिया था. और आज मेरे रब का वादा पूरा हो गया. अब हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम का हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से सामना हुआ तो हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने पीछे पलट करके कहा की आज बेटे से मुलाक़ात का दिन है, आज मैंने अपने मुक़स्सिर फ़रज़न्दान का क़ुसूर माफ़ कर दिया और जाओ, मैं अपने रब को अपना शाहिद बनाता हूँ और मैं उससे दुआ करता हूँ की वो भी तुम्हें माफ़ फ़रमाए.
और उधर हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने भी ये ऐलान कर दिया की आज मैं अपने वालिद-ए मोहतरम से दोबारा मिल रहा हूँ और इस ख़ुशी में, मैं तमाम मरदम-ए मिस्र को अपनी ग़ुलामी से आज़ाद कर रहा हूँ, आज सारे मिस्र वाले आज़ाद हैं. हज़रत यूसुफ़ और हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलातु वस्सलाम दोनों ही इस ख़ुशी की ताब ना ला सके और जैसे ही हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की नज़र-ए मुबारका अपने नूर-ए नज़र हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम के चेहरा-ए मुबारक पड़ी तो हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ज़ोर से चीख़ मारकर बेहोश हो गए और अपने वालिद-ए मोहतरम को बेहोश होता देखकर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम भी अपने होश खो बैठे.
जब दोनों को होश आया तो हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने अपने लख़्त-ए जिगर से पूछा की ऐ यूसुफ़! मैं अब तुम्हारी ज़ुबान से सारी दास्तान सुनने का ख़्वाहां हूँ की तुम्हारे साथ क्या क्या वाक़ेआत रूनुमा हुए? बताओ मुझे, तुम्हारे भाइयों ने तुम्हारे साथ कैसा रवैया इख़्तियार किया? हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने अपने वालिद-ए मोहतरम को बिठाकर सारी दास्तान सुनाई. फिर आप अलैहिस्सलाम हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम को अपने क़स्र ले गए.
वहाँ हज़रत याक़ूब और अपनी ख़ाला और सौतेली माँ हज़रत लीया रज़िअल्लाहु तआला अन्हा और अपने 11 भाइयों के लिए तख़्तों का अहतमाम किया फिर हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलातु वस्सलाम और हज़रत लीया रज़िअल्लाहु तआला अन्हा और आप अलैहिस्सलाम के तमाम 11 भाइयों ने हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम को सजदा किया. अपने अहले ख़ाना को अपने मक़ाबिल सजदारेज़ देखकर हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया की बिलआख़िर आज मेरे ख़्वाब की ताबीर अपनी तकमील को जा पहुंची. आज मुझे मेरे रब ने जो ख़्वाब मेरे बचपन में दिखाया था, पूरा हुआ.
बहरहाल, हज़रत यूसुफ़ ने हज़रत याक़ूब से कहा की आप यहीं रहें, इसी क़स्र में, मेरे पास और आप का मुक़ाम ये सोने का तख़्त है. हज़रत याक़ूब ने कहा की नहीं, तुम बादशाह हो, ये तुम्हें ज़ैब देता है और ये तुम्हारा हक़ है. मेरे लिए तुम अल्हैदा कमरा तामीर कर दो. मैं वहीं रहां करूंगा, तुम रोज़ का वक़्त अपने क़स्र में गुज़ारां करो और जब शब हो जाए तो मेरे पास आकर सोयाँ करो. इस तरह 40 सालों तक हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम अपने नूरे नज़र हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के पास मिस्र में रहते हैं और जब 40 साल पूरे होने को आये तो अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्राईल को भेजा की ऐ याक़ूब! अब आपके विसाल का वक़्त क़रीब आ चुका है.
लिहाज़ा आप अपने आबाई वतन, फ़लस्तीन (बैतुल मुक़द्दस) लौट जाएँ वहीं आपकी रूह क़ब्ज़ की जायगी हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से कहा की ऐ नूरे नज़र! अब इस दुनिया से रुख़सत होने का वक़्त क़रीब आ चुका है. दोनों वालिद ओ फ़रज़न्द हज़रात, एक दुसरे से लिपट कर ख़ूब अश्क बहाते हैं और फिर हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम फ़लस्तीन (बैतुल मुक़द्दस) की जानिब हिजरत कर गए और वहाँ लौटकर आप अलैहिस्सलाम का विसाल हो जाता है.
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम अपने वालिद-ए मोहतरम के विसाल के बाद अल्लाह तआला की बारगाह में अर्ज़ करते हैं ऐ मेरे मौला! मेरे बाबा का विसाल हो चुका है, मैं अपने वालिद के बग़ैर नहीं रह सकूंगा लिहाज़ा अब तू मुझे भी अपने पास बुला ले. अल्लाह ने फ़रमाया, नहीं, ऐ सिद्दीक़! अभी वो वक़्त नहीं आया, जब तक तुम्हारे पोते-पोतियों की तादाद कुल मिलाकर 600 नहीं हो जाती है. तुम्हें अपनी बारगाह में नहीं बुलाएंगे तुम अपनी आँखों के सामने अपने पोते-पोतियों को देखोगे.
जब आप अलैहिस्सलाम के 11 फ़रज़न्दान से आपके अहले ख़ाना की तादाद 600 तक फैल गयी तो हज़रत-ए ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा का विसाल हो गया और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को हज़रत- ए ज़ुलैख़ा रज़िअल्लाहु तआला अन्हा से इतनी मोहब्बत हो गयी थी की हज़रत-ए ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा के विसाल के सिर्फ़ 20 रोज़ बाद सय्यदना हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम भी विसाल फ़रमा गए.
हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा की मिस्र ही में तदफ़ीन की गयी. आप अलैहिस्सलाम का विसाल हुआ और आपको ग़ुस्ल दिया गया और हज़रत अफ़राहीम अलैहिस्सलाम ने ग़ैब की आवाज़ सुनी की जनाज़ा नहर-ए क़य्यूम पर ले जाया जाये. जब जनाज़ा वहाँ लेकर गए तो दरया फट गया वहाँ एक क़ब्र नज़र आई उसी क़ब्र में हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम को दफ़न किया गया और जब मिटटी डाल दी गयी तो हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की क़ब्र पर से दोबारा पानी बहने लगा.
हज़रत यूसुफ़ को दरया में इसीलिए दफ़न की गया था क्योंकि तमाम मिस्र का हर कोई शख़्स चाहता था की हज़रत यूसुफ़ की क़ब्र हमारे घर के पास हो, ताकि हमारे घर में बरकत और रहमत हो मगर नहरे क़य्यूम ऐसी जगह थी. जहां से मिस्र के हर मकान में पानी जाता था और हज़रत यूसुफ़ ने अपनी औलाद को वसीयत की थी की जैसे मैं आया था, उसी तरह एक रोज़ बनी इसराईल को हिजरत करके यहां से वापस जाना भी पड़ेगा लिहाज़ा जब तुम्हारा जाना हो तो मेरी क़ब्र को खोलकर मेरा जिस्म भी अपने साथ ले जाना.
और मुझे अपने वालिद हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के क़दमों में दफ़न कर देना, यूं सदियों तक मिस्र पर आल-ए हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की हुकूमत क़ायम रही. जब ये अपने दीन से फिर गए तो अल्लाह तआला ने इन पर फ़िरौन को मुसल्लत कर दिया. फिर 400 सालों बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पैदा हुए और उन्होंने बनी इसराईल के हमराह मिस्र से शाम हिजरत करना चाहा तो सबसे अव्वल हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का जिस्म मुबारक उनकी क़ब्र मुबारक से निकाल लिया गया. सैकड़ों साल बीत गए थे.
मगर जब दरिया में हज़रत मूसा ने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का जिस्म मुबारक निकालने के लिए असा मारा और जब क़ब्र को खोला गया तो पाया की उनका तो क़फ़न भी मैला नहीं हुआ था. दरयाफ़्त हुआ की अल्लाह वाले क़ब्रों में सलामत रहते हैं और फिर जिस्म मुबारक निकालकर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बनी इसराईल के हमराह शाम हिजरत कर गए और वहाँ ले जाकर हज़रत यूसुफ़ को उनके वालिद-ए मोहतरम के क़दम मुबारक में दफ़न कर दिया गया.
सिलसिला-ए क़स्सास उल अ़नबिया में हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम के हालात-ए ज़िन्दगी पर मुस्तमिल ये आख़िरी क़िस्त थी. सिलसिला-ए क़स्सास अल अनबिया में अगला मज़मूम हज़रत अय्यूब-ए साबिर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की हयात-ए मुबारका के हालात व वाक़ेआत पर मुस्तमिल होगी, जो इस मज़मून से 6 रोज़ बाद (तारीख़ 18/July/2022 की शब 8:45 मिनट पर) अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम शाया कर दी जायगी - इंशा अल्लाह.
मज़ीद इसी तरह की तारीख़ी और इस्लामी माअलूमात के हुसूल की ग़र्ज़ से निज़ाम-ए आलम के साथ अपनी वाबस्तगी और मोहब्बत मुसलसल इसी तरह जारी रखें और बर-ऐ निज़ाम-ए आलम अपनी मोहब्बत ज़ाहिर करते हुए इस मज़मून की ज़्यादा से ज़्यादा इश्तराक गुज़ारी करें.
मोहतरम मुअज़्ज़िज़ीन ओ क़ारईन-ए अहले निज़ाम-ए आलम, मज़ीद अर्ज़ है की ज़ेर-ए मज़मून नख़्श-ए नज़रात में अपनी क़ीमती नज़र का इज़हार करते हुए अपनी ख़्वाहिशात से आगाह कर सकते हैं की हमारा अगला मज़मून किस मौज़ूं पर मुस्तमिल होना चाहिए?
शुक्रिया-
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