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क़सस अल अनबिया: हज़रत यूसुफ़ علیہ السلام - क़िस्त नं. 7 | Joseph - Prophet Yusuf |

क़स्सास उल अनबिया: हज़रत-ए यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम - क़िस्त नं. 7 | Joseph - Prophet Yusuf |
क़स्सास उल अनबिया: हज़रत-ए यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम - क़िस्त नं. 7

क़स्सास उल अनबिया: हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम

शुरू ख़ुदावंद-ए सुब्हान के बा-बरकत नाम से जो दिलों का मालिक है और जो दिलों के राज़ बख़ूबी जानता है-

दुरूद ओ सलाम बर तमाम मुअज़्ज़िज़ क़ारईन ओ ज़ायरीन, अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम आप मुअज़्ज़िज़ीन को मुहब्बतों भरा अस्सलामु अ़लैकुम व ख़ुश आमदीद, मैं आपका मेज़बान ज़ुलक़रनैन मुहम्मद सुलैमान और आप इस वक़्त मेरे साथ मौजूद हैं निज़ाम-ए आलम पर-

बक़ब्ल-ए मुताअला तमाम ज़ायरीन ओ क़ारईन से गुज़ारिश पेश है की आज के इस मज़मून का मुताअला भी मस्ल-ए हमेशा दुरूद-ए इब्रहीम के साथ ही शुरू करें. एक बार दरूद पढ़ लेने से ख़ुदावंद-ए मतआल क़ारी पर 10 मर्तबा अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमाता है-

بسم الله الرحمن الرحيم
  • - اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ،
  • - اللَّهُمَّ بَارِكَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَ ا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ 

दुरूद ओ सलाम बर ख़िताम अल अनबिया ओ मुरसलीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम व दुरूद ओ सलाम बर नबी-ए ख़ुदावंद-ए सुब्हान जनाब-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ (अलैहिस्सलातुवस्सलाम):

हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम - क़िस्त नं.7

जब अज़ीज़-ए मिस्र जनाब-ए ज़ुलैख़ा के साथ जनाब-ए यूसुफ़ को फ़रोख़्त करने के लिए बरदा-फ़रोशों के बाज़ार में आया तो हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ने हज़रत-ए यूसुफ़ को देखते ही ज़ोर से चीख़ मारी और ये कहते हुए की ये बच्चा कोई ग़ुलाम नहीं ये तो मेरा शौहर है, उसी जगह बेहोश हो गयी. हिब्र उल उम्माह, सहाबी-ए रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि व सल्लम, हज़रत-ए अब्दुल्लाह इब्न अब्बास रदिअल्लहु तआला अ़न्हु फ़रमाते हैं, दर हक़ीक़त हज़रत-ए ज़ुलैख़ा यमन के बादशाह तैमूस की बेटी थीं. 

हज़रत-ए ज़ुलैख़ा के वालिद तैमूस मग़रिब के बहुत बड़े बादशाह थे. हज़रत- ए ज़ुलैख़ा तमाम दुनिया भर में अपने दौर की औरतों में सबसे ज़्यादा ख़ूबरू थीं या यूं कह लें की हज़रत- ए ज़ुलैख़ा के दौर में उनसे ज़्यादा खूबसूरत औरत दुनिया भर में कहीं भी नहीं थी हज़रत- ए ज़ुलैख़ा से रिश्ता- ए अज़्दवाज करने के लिए मुख़्तलिफ़ 19 मुमालिक के बादशाहों का पैग़ाम आया था. 

जब हज़रत-ए ज़ुलैख़ा नौ साल की थीं तो आप पागल हो गयीं थीं और आपको ये बीमारी मुसलसल 3 साल तक लगी रही. आपके पागल होने की ये वजह थीं की आपने नौ साल की उम्र में हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को अपने ख़्वाब में देखा था और आप अलैहिस्सलाम के हुस्न को देखकर वो आप علیہ السلام पर शैदा हो गयीं थीं और जब आँखें खुलीं तो चीख़ने लगी.


पैग़म्बर-ए इस्लाम साहिबुल जमाल सय्यदुल बशर रहमतुल्लिल आलमीन हज़रत मुहम्मद- ए मुस्तफ़ा अहमद- ए मुज्तबा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम फ़रमाते हैं की यूसुफ़ का हुस्न मेरे हुस्न का आधा है. 

हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि व सल्लम के हुस्न को बयान करते हुए शायर लिखते हैं -

हुस्न-ए यूसुफ़ पे कटीं मिस्र में अंगुश्त-ए ज़ना,
सर कटाते हैं, तेरे नाम पर मर्दान-ए अरब.

ख़ुदावन्द-ए सुब्हान ने हुस्न के 10 हिस्से किये और उसमे से नौ हिस्से अकेले हज़रत-ए यूसुफ़ को अता किये और बाक़ीमान्दा 1 हिस्सा तमाम दुनिया को अता कर किया -

बहरहाल, हज़रत-ए ज़ुलैख़ा की चीख़ें सुनकर उनके वालिद तैमूस आये और पूछा, ऐ नूर-ए नज़र, क्या हुआ? क्यों चीख़ने लगी हो? हज़रत-ए ज़ुलैख़ा फ़रमाने लगी कि बाबा, मैंने अपने ख़्वाब में एक ख़ूबरू जवान देखा. मेरी अक़्ल काम नहीं कर रही, मैं उस पर शैदा हो गयी हूँ. वालिद ने कहा, ऐ मेरी दुख़्तर अब अगर वो दोबारा ख़्वाब में नज़र आये तो उस से पूछना की वो कौन है? और कहाँ का रिहाइशी है?

मैं उसे पाने की ख़ातिर अपनी तमाम हुक़ूमत दाव पर लगा दूंगा, वो जहां भी मिलेगा, मैं तुम्हें उसके पास ले चलूँगा. हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ने एक साल के तवील अरसे के बाद दोबारा फिर ख़्वाब में हज़रत-ए यूसुफ़ को देखा. इस बार ख़्वाब में दोनों हज़रात के दरमियान गुफ़तगू हुई. दौरान-ए गुफ़तगू हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ने हज़रत-ए यूसुफ़ से पूछ लिया की आप कौन हैं? हज़रत-ए यूसुफ़ ने फ़रमाया, मैं इंसान हूँ, मैं तेरे लिए हूँ और तू मेरे लिए है. 

हज़रत-ए यूसुफ़ इतना कहते हैं की यहीं हज़रत-ए ज़ुलैख़ा की आँख खुल जाती है और ख़्वाब ख़त्म हो जाता है. अब हज़रत-ए ज़ुलैख़ा के पागलपन की कोई इंतेहा नहीं रही थी. पागलपन तो इस हद तक बढ़ा की आपको ज़िन्दान में क़ैद कर दिया गया ताकि हज़रत-ए ज़ुलैख़ा अपने पागलपन की वजह से कहीं किसी को कुछ नुक़सान ना पहुंचा दें, हज़रत- ए ज़ुलैख़ा मुसलसल एक साल के अरसे तक ज़िन्दान में क़ैद रहीं, 

ना खाने का कुछ पता था और ना पीने का. तीसरी मर्तबा एक साल के अरसे के बाद फिर हज़रत-ए ज़ुलैख़ा हज़रत-ए यूसुफ़ को अपने ख़्वाब में देखतीं हैं और इस बार हज़रत-ए ज़ुलैख़ा आप अलैहिस्सलाम से पूछती हैं की आप कौन हैं? और कहाँ मिलेंगे? आप हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया, मैं मिस्र का बादशाह हूँ और मैं मिस्र में मिलूंगा. इस ख़्वाब के बाद जब सुब हुई तो हज़रत-ए ज़ुलैख़ा का सारा पागलपन ख़त्म हो गया. वालिद से पुकारकर कहा, बाबा जान, मैं ठीक हो गयी हूँ और उसने अपना पता बता दिया है की वो मिस्र का बादशाह है

और मिस्र में मिलेगा तो जिन 19 मुमालिक में बादशाहों ने हज़रत ज़ुलैख़ा से रिश्ता-ए अज़्दवाज क़ायम करने की ग़र्ज़ से पैग़ाम भिजवाए थे. हज़रत ज़ुलैख़ा ने अपने वालिद से कहा की क्या उन मुमालिक में मिस्र का नाम भी शामिल है वालिद ने कहा नहीं ऐ मेरी दुख़्तर हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा ने अपने वालिद से कहा की मुझे तो मिस्र के बादशाह की हमसरी चाहिए लिहाज़ा वालिद तैमूस ने उन तमाम पैग़ामात को रद्द कर दिया.

और अज़ीज़-ए मिस्र को ख़त लिखा. यमन और मिस्र के दरमियान उस ज़माने में 6 महीनों की मुसाफ़त थी. बहरहाल हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा की शादी अज़ीज़-ए मिस्र से हुई. हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा के वालिद ने 1000 ग़ुलाम और 1000 कनीज़ों और दीगर अक़्साम के कई साज़ ओ सामान के साथ आप सलामुल्लाह अलैहा को रुख़सत किया 

हज़रत- ए ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा इन ख़यालात में ग़र्क़ थीं की वो कितना हसीन है? कितना जवान ओ ख़ूबरू है? आज मेरे दिल की ख़्वाहिश पूरी हो गयी, आज तमाम फ़ासले ख़त्म हुए. चूंकि वहां ये रस्म थी की अज़दवाज से क़ब्ल मर्द या ख़ातून यकदीगर को देख नहीं सकते थे लिहाज़ा जब शादी हो जाने के बाद अज़ीज़-ए मिस्र हज़रत-ए ज़ुलैख़ा के कमरे में दाख़िल हुआ, उन्होंने अपनी कनीज़ से पूछा की ये कौन है? 

कनीज़ ने कहा, यही तो आपका शौहर है, उसे देखकर हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा की हालत ख़राब होने लगी. उन्होंने अपने हाथों से अपना चेहरा ढांप लिया. दिल में ख़याल किया की नहीं, ये मेरा शौहर नहीं है. उसने तो कहा था की वो मिस्र का बादशाह है, मगर ये वो नहीं है. 

हज़रत ज़ुलैख़ा की कनीज़ ने उन से कहा कि ख़ुद आप ही ने तो अज़ीज़-ए मिस्र की हमसरी की ख़्वाहिश की थी मगर ना आपके लिए तो बड़े बड़े मुमालिक से पैग़ाम आये थे. एक फरिश्ता परिंदे की शक़्ल में आया और हज़रत ज़ुलैख़ा से कहने लगा सब्र करो और यहीं रहो जिससे तुम्हारी ख़्वाब में मुलाक़ातें हुईं हैं वो तुम्हें यहीं मिलेगा तो चूंकि इरादा-ए ख़ुदावन्द कुछ और ही था और हज़रत ज़ुलैख़ा को हज़रत यूसुफ़ के लिए मुक़र्रर कर रखा था. 

इसीलिए ख़ुदावन्द-ए मेहरबान ने एक जिन्न औरत को हज़रत ज़लीख़ा सलामुल्लाह अलैहा की शक़्ल में अज़ीज़-ए मिस्र के पास भेज दिया. वो जिन्न औरत रात भर अज़ीज़-ए मिस्र का दिल बहलाती रही मगर बादशाह इसी ग़ुमान में था की ये हज़रत ज़लीख़ा سلاملله عليها है. इस तरह दोनों के दरमियान फ़ासलों से मोहब्बत थी और इस तरह अज़ीज़-ए मिस्र से शादी कर लेने के बाद भी हज़रत-ए ज़ुलैख़ा महफ़ूज़ रहीं. 

हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ने सब्र किया और एक दिन ऐसा आया की जब ग़ुलाम की सूरत में हज़रत-ए यूसुफ़ علیہ السلام बाज़ार-ए मिस्र में मिस्र के अगले बादशाह बनकर आये. बादशाह-ए मिस्र, क़ित्तिन मलिका-ए अज़ीम मिस्र हज़रत-ए ज़ुलैख़ा سلاملله عليها के साथ हज़रत यूसुफ़ को देखने के लिए गयीं. बादशाह-ए मिस्र अपने मुहाफ़िज़ों के हमराह और हज़रत ज़ुलैख़ा के साथ बादशाह की दूसरी बीवी थी. 

बहरहाल जैसे ही हज़रत ज़ुलैख़ा की पहली नज़र जैसे ही हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के चेहरा-ए मुबारक पर पड़ी, हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा चीख़ मारकर बेहोश हो गयीं. आप सलामुल्लाह अलैहा ने ज़ोर से चीख़ कर कहा कि ये तो वही है, जिसे मैंने अपने ख़्वाब में देखा था. यही है, जिसने मुझसे ख़्वाब में कहा था कि तुम मेरे लिए हो और में तुम्हारे लिए हूँ, मैं मिस्र का बादशाह हूँ, मगर ग़ुलाम बनकर आया है. 

फि जब और हज़रत ज़ुलैख़ा سلاملله عليها को होश आया तो बादशाह-ए मिस्र क़ित्तिन से कहा की मुझे हर हाल में ये ग़ुलाम चाहिए, कहीं ऐसा ना हो कि ये हाथ से निकल जाये, क्योंकि ख़रीदने के लिए सारा मिस्र जमा हो गया है. 
अज़ीज़-ए मिस्र को देखकर लोगों में उसके मुक़ाबिल खड़े होने की और जनाब-ए यूसुफ़ को फ़रोख़्त करने की किसी ने हिमाक़त ना की और ये कहकर चले गए की अज़ीज़-ए मिस्र के मुक़ाबिल भला कौन इस बच्चे को फ़रोख़्त करने की जुर्रत कर सकता है? ये बच्चा आज से अज़ीज़-ए मिस्र का ग़ुलाम होगा. 

अज़ीज़-ए मिस्र ने मालिक इब्न ज़ार से पूछा की इस बच्चे की क़ीमत क्या है. मालिक इब्न ज़ार ने बादशाह से कहा, चूंकि आप बादशाह हैं और इस इबरानी ग़ुलाम को मुझसे फ़रोख़्त करने के ख़्वाहां हैं, तो मुझे इसके वज़न के बराबर सोना चाहिए और इसके वज़न के बराबर चांदी भी चाहिए, इसके वज़न के बराबर मोती भी चाहिए, इसके वज़न के बराबर मुझे याक़ूत भी चाहिए, यूसुफ़ के वज़न के बराबर मैं रेशम भी चाहता हूँ.

इसके वज़न के बराबर अम्बर भी चाहता हूँ, इसके वज़न के बराबर मुझे मुश्क़ भी दरकार है, इसके वज़न के बराबर मैं क़ाफ़ूर भी चाहता हूँ. बादशाह कहता है मुझे मंज़ूर है मगर पहले उसे तोलो तो सही हज़रत-ए यूसुफ़ उस वक़्त महज़ 10 साल के थे आपको तोलने के लिए गाय को ज़िबाह किया गया और उस का चमड़ा फाड़कर, उस से तराज़ू बनाया गया. एक तरफ़ हज़रत यूसुफ़ علیہ السلام को रखा गया और दूसरी जानिब बादशाह के ख़ज़ाने का सारा सरमाया रख दिया गया.

अगरचे बादशाह को क़ीमत कम लग रही थी. बादशाह सोच रहा था की भला एक 10 साला बच्चा आख़िर कितना वज़नी हो सकता है लेकिन चूँकि वो वज़न नूर-ए रिसालत का वज़न था तो बादशाह का तमाम ख़ज़ाना भी कम पड़ गया. बादशाह-ए मिस्र की तमाम दौलत उस तराज़ू के एक पलड़े में आ गयी थी मगर जनाब-ए यूसुफ़ का वज़न उससे भी ज़्यादा था. बिलआख़िर रईस-ए ख़ज़ाना दौड़ा चला आता है और बादशाह से कहता है की अब सारा ख़ज़ाना ख़ाली हो चुका है.

बादशाह-ए मिस्र क़ित्तिन जनाब-ए ज़ुलैख़ा की तरफ़ देखता है मगर हज़रत-ए ज़ुलैख़ा तो अब भी अपनी ज़िद पर क़ायम हैं. बादशाह-ए मिस्र क़ित्तिन मालिक इब्न ज़ार से कहता है, की तुम मेरे अहसानमंद हो सारा शाही ख़ज़ाना मैं तुम्हें देता हूँ और तुम मुझे यूसुफ़ बेचने के बजाय हदिया कर दो. मालिक इब्न ज़ाअरान दिल में ख़याल करता है की अज़ीज़-ए मिस्र अपना तमाम शाही सरमाया मुझे दे रहे हैं.

फिर भी यूसुफ़ को तोहफ़तन मुझसे तलब कर रहे हैं. कुछ देर बाद मालिक इब्न ज़ाअरान कहता है कि मुझे ये सौदा मंज़ूर हैं. मैं यूसुफ़ को बतौर-ए तोहफ़ा आपकी ख़िदमत में पेश करता हूँ. यूं मालिक इब्न ज़ाअरान ने सय्यदना यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को बादशाह-ए मिस्र को तोहफ़तन दे दिया गया मगर बादशाह की तमाम शाही दौलत हज़रत- ए सय्यदना यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को ख़रीदने के लिए दांव पर लग गयी. 

शैख़ उल इस्लाम हज़रत-ए इमाम-ए ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं की बरोज़- ए क़ियामत मुस्लिमीन के गुनाह एक पलड़े में रखे जायेंगे और दूसरे पलड़े में ईमान रखा जायगा. बज़ाहिर दूसरे के मद्दे मुक़ाबिल गुनाहों की कोई हैसियत ना होगी लिहाज़ा जिस पलड़े में ईमान रखा होगा वो वज़नी रहेगा, इसी के बाइस मुस्लिमीन के गुनाह बख़्श दिए जायेंगे.  

फ़िल-वक़्त आज की माअ़लूमात का हम यहीं इख़्तेताम करते हैं. सिलसिला-ए क़स्सास उल अ़नबिया में हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम के हालात-ए ज़िन्दगी पर मुस्तमिल अगली 8th क़िस्त जल्द अज़ जानिब- ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम शाया कर दी जायगी - इंशा अल्लाह. 

मज़ीद इसी तरह की तारीख़ी और इस्लामी माअलूमात के हुसूल की ग़र्ज़ से निज़ाम-ए आलम के साथ अपनी वाबस्तगी जारी रखें और बर-ऐ निज़ाम-ए आलम अपनी मोहब्बत ज़ाहिर करते हुए इस मज़मून की ज़्यादा से ज़्यादा इश्तराक गुज़ारी करें. 

शुक्रिया- 

✍️- Jalal Ibn Taymous
Translator & Publisher - Zulqarnayn Sulayman

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