ईरानी ड्रामा सीरीज़, यूसुफ़-ए पयाम्बर की अस्ल हक़ीक़त?
मलिका-ए मिस्र, हज़रत ज़ुलैख़ा कौन थीं?
हज़रत अ़ब्दुल्लाह इब्न अ़ब्बास रदिअल्लाहु अ़न्हु अपनी तफ़सीर-ए क़ुरआन लिखते हैं कि हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अ़लैहा बादशाह-ए यमन की बेटी थीं. आप के वालिद तैमूस मग़रिब के बहुत बड़े बादशाह थे. जब आप सलामुल्लाह अ़लैहा की उम्र नौ साल हुई तो आप ने ख़्वाब में सय्यदना हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलातु वस्सलाम को देखा था. तब ही से आप सलामुल्लाह अ़लैहा, आप अ़लैहिस्सलाम की शैदाई हो गयीं थीं. अगरचे अभी तक हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम दुनिया में जलवागर नहीं हुए थे. इसी बारे में हज़रत इमाम-ए ग़ज़ाली रहमहुल्लाह अ़लैह लिखते हैं कि हज़रत ज़ुलैख़ा की इब्तिदाई जवानी थी.
आप सलामुल्लाह अ़लैहा ने हज़रत सिद्दीक़ अ़लैहिस्लाम को अपने ख़्वाब में देखा था. बहरहाल जब आप की आंख खुली तो आप ने ज़ोर से चीख़ मारी. आप सलामुल्लाह अ़लैहा की चीख़ें सुनकर आप के वालिद तैमूस आये और कहा, ऐ मेरी दुख़्तर! क्या हुआ? आप सलामुल्लाह अ़लैहा ने फ़रमाया कि मैंने ख़्वाब में एक ख़ूबरू जवान देखा है. मैं उस पर फ़िदा हो गयी हूँ. मेरी अक़्ल ही काम नहीं कर रही है. मैं उस पर शैदा हो गयी हूँ. वालिद ने कहा, ऐ मेरी दुख़्तर! अब अगर वो जवान दोबारा तुम्हें ख़्वाब में नज़र आये तो उस से पूछना की वो कौन है?
और कहाँ का रिहाइशी है? मैं उसे पाने की ख़ातिर अपनी तमाम हुकूमत दाव पर लगा दूंगा, वो जहां भी मिलेगा, मैं तुम्हें उसके पास ले चलूँगा. हज़रत ज़ुलैख़ा ने एक साल के तवील अरसे के बाद दोबारा फिर ख़्वाब में हज़रत यूसुफ़ को देखा. इस बार ख़्वाब में दोनों के दरमियान गुफ़्तगु हुई. दौरान-ए गुफ़्तगु हज़रत ज़ुलैख़ा ने हज़रत यूसुफ़ से पूछ लिया की आप कौन हैं? हज़रत यूसुफ़ ने फ़रमाया, मैं इंसान हूँ, मैं तेरे लिए हूँ और तू मेरे लिए है. हज़रत यूसुफ़ बस इतना कहते हैं कि यहीं हज़रत ज़ुलैख़ा की आँख खुल जाती है.
और ख़्वाब ख़त्म हो जाता है. यही ख़्वाब हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अ़लैहा के पागल हो जाने का सबब बनता है. और आपको ये बीमारी मुसलसल 3 साल तक लगी रही. पागलपन तो इस हद तक बढ़ा कि आप को ज़िन्दान में क़ैद कर दिया गया ताकि हज़रत ज़ुलैख़ा अपने पागलपन की वजह से कहीं किसी को कुछ नुक़सान ना पहुंचा दें, हज़रत ज़ुलैख़ा मुसलसल एक साल के अरसे तक ज़िन्दान में क़ैद रहीं. तीसरी मर्तबा एक साल के अरसे के बाद फिर हज़रत ज़ुलैख़ा हज़रत यूसुफ़ को अपने ख़्वाब में देखतीं हैं और इस बार हज़रत ज़ुलैख़ा आप अ़लैहिस्सलाम से पूछती हैं कि आप कौन हैं? और कहाँ मिलेंगे?
हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम ने फ़रमाया, मैं मिस्र का बादशाह हूँ और मैं मिस्र में मिलूंगा. इस ख़्वाब के बाद जब सुब हुई तो हज़रत ज़ुलैख़ा का सारा पागलपन ख़त्म हो गया. वालिद से पुकारकर कहा, बाबा जान मैं ठीक हो गयी हूँ और उसने अपना पता बता दिया है कि वो मिस्र का बादशाह है. आप सलामुल्लाह अ़लैहा से शादी करने के लिए मुख़्तलिफ़ 19 मुमालिक के बादशाहों ने पैग़ाम भेजा था. हज़रत ज़ुलैख़ा ने अपने वालिद से कहा कि क्या उन मुमालिक में मिस्र का नाम भी शामिल है? वालिद ने कहा, नहीं, ऐ मेरी दुख़्तर!. हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अ़लैहा ने अपने वालिद से कहा कि मुझे तो मिस्र के बादशाह से शादी करना है.
लिहाज़ा वालिद तैमूस ने उन तमाम पैग़ामात को रद्द कर दिया और अ़ज़ीज़-ए मिस्र, जिसका नाम क़ित्तीन था, को ख़त लिखा. यमन और मिस्र के दरमियान उस ज़माने में 6 महीनों की मुसाफ़त थी. बहरहाल, हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अ़लैहा की शादी अ़ज़ीज़-ए मिस्र से हुई. हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अ़लैहा के वालिद ने 1000 ग़ुलाम और 1000 कनीज़ों और दीगर अक़्साम के कई साज़ ओ सामान के साथ आप सलामुल्लाह अ़लैहा को रुख़सत किया. हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अ़लैहा इन ख़यालात में ग़र्क़ थीं कि वो कितना हसीन है?
कितना जवान ओ ख़ूबरू है? आज मेरे दिल की ख़्वाहिश पूरी हो गयी. चूंकि वहां ये रस्म थी कि अज़दवाज से क़ब्ल मर्द या ख़ातून यकदीगर को देख नहीं सकते थे. लिहाज़ा जब शादी हो जाने के बाद अ़ज़ीज़-ए मिस्र हज़रत ज़ुलैख़ा के कमरे में दाख़िल हुआ, उन्होंने अपनी कनीज़ से पूछा कि ये कौन है? कनीज़ ने कहा यही तो आपका शौहर है, उसे देखकर हज़रत ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अ़लैहा की हालत ख़राब होने लगी. उन्होंने अपने हाथों से अपना चेहरा ढांप लिया. दिल में ख़याल किया, कि नहीं, ये मेरा शौहर नहीं है.
उसने तो कहा था कि वो मिस्र का बादशाह है, मगर ये वो नहीं है. हज़रत ज़ुलैख़ा की कनीज़ ने उन से कहा कि ख़ुद आप ही ने तो अ़ज़ीज़-ए मिस्र की हमसरी की ख़्वाहिश की थी. मगर ना आपके लिए तो बड़े-बड़े मुमालिक से पैग़ाम आये थे. एक फरिश्ता परिंदे की शक़्ल में आया और हज़रत ज़ुलैख़ा से कहने लगा कि सब्र करो और यहीं रहो, जिससे तुम्हारी ख़्वाब में मुलाक़ातें हुईं हैं वो तुम्हें यहीं मिलेगा. तो चूंकि इरादा-ए ख़ुदावन्द कुछ और ही था और हज़रत ज़ुलैख़ा को हज़रत यूसुफ़ के लिए मुक़र्रर कर रखा था. इसीलिए ख़ुदावन्द-ए मेहरबान ने एक जिन्न औ़रत को हज़रत ज़लीख़ा سلام اللہ علیہا की शक़्ल में अ़ज़ीज़-ए मिस्र के पास भेज दिया.
वो जिन्न औ़रत रात भर अ़ज़ीज़-ए मिस्र का दिल बहलाती रही. मगर बादशाह इसी ग़ुमान में था कि ये हज़रत ज़लीख़ा سلام اللہ علیہا है. इस तरह दोनों के दरमियान फ़ासलों से मोहब्बत थी और इस तरह अ़ज़ीज़-ए मिस्र से शादी कर लेने के बाद भी हज़रत ज़ुलैख़ा महफ़ूज़ रहीं. आप ने सब्र किया और एक दिन ऐसा आया जब मिस्र के अगले बादशाह सय्यदना हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अ़लैहिस्सलातु वस्सलाम ग़ुलाम की सूरत में बाज़ार-ए मिस्र में तशरीफ़ लाये.
लिहाज़ा अब फ़ैसला आप का है. अब इन दलाइल को जुलू-ए दीद रखते हुए बताएं, आया शिअ़्यान का फ़िल्माया गया बे अस्बाता ड्रामा बरहक़ है? या फिर उलमा-ए अहले सुन्नत رضي الله عنهم والصلاة والسلام عليهم ورحمة الله. और असहाब-ए रसूलल्लाह محمد صلى الله عليه وآله وسلم وعلى أولاده की तहरीर शुदा तफ़ासीर-ए क़ुरआन?
फ़िरऔ़न-ए मिस्र, आख़्नातून कौन था?
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| आख़्नातून और उसकी हमसर नफ़रतीती, आतून की परस्तिश करते हुए. |
आया इन वाज़ेह दलाइल के बावजूद अब भी कोई ये कहेगा कि नहीं, आख़्नातून ही हज़रत यूसुफ़ علیہ السلام के ज़माने में मिस्र का बादशाह था?
तो मैं मज़ीद चंद शवाहिद पेश करता हूँ -
दर हक़ीक़त, हज़रत मूसा अ़लैहिस्सलाम से 80 साल क़ब्ल ही आख़्नातून मुतवल्लिद होकर गुज़र चुका था और हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम इससे 320 सालों क़ब्ल ही गुज़र चुके थे. आख़्नातून को सय्यदना हज़रत यूसुफ़ علیہ السلام से मुनसलिक करने की भी वजह वोही ईरानी ड्रामा सीरीज़ यूसुफ़-ए पयाम्बर है और दूसरी सबसे बड़ी वजह ये है कि उसने मिस्र में राइज अपने अजदाद के 3000 साल क़दीम आईन को तर्क करके एक नया मज़हब चलाया. जिसमें उसने तमाम मरदम-ए मिस्र को बेशुमार बुतों की परस्तिश को तर्क करके एक ख़ुदा यानी परस्तिश-ए ख़ुर्शीद की जानिब दावत दी और उसने अपने इस नए ख़ुदा का नाम आतून (Aten) रखा.
इसी नए ख़ुदा के नाम पर अपना नाम आमून हुतब चहारुम (Amenhotep IV) से तब्दील करके आख़्नातून रख लिया. जिसका माअ़्ना आतून का बंदा है. 15 साला उम्र तक पहुँच कर उसने अपने आईन और नाम की तब्दीली के हमराह अपनी मुमलिकत का मौजूदा काहिरा से 160 मील की मुसाफ़त पर एक नए दार उल हुकूमत की ताअ़्मीर का हुक्म दिया और उसने इस शहर का नाम अपने ख़ुदा के नाम पर अख़्तातून (Akhetaten) रखा. आख़्नातून ने 17 साल तक मिस्र पर हुकूमत की और फिर इसकी साँसों ने इससे वफ़ा ना की और अपने लाइलाज मर्ज़ के बाइस 37 साला उम्र में, 1335 क़ब्ल-अज़ मसीह में आख़्नातून इस दुनिया को अलविदा कह गया.
आख़्नातून ख़ून रैज़ी और जंग ओ जद्ल से परहेज़ करता था. आख़्नातून के बाअ़्द इसके बेटे तूतांख़ातन ने इसके आबाद करदा, दार अल हुकूमत को पूरी तरह से तबाह ओ बर्बाद कर दिया और उस फ़िरऔ़न तूतांख़ातन ने अपना आईन तब्दील करके फिर से आमून की परस्तिश शुरूअ़् कर दी और अपना नाम भी तूतांख़ातन से बदलकर तूत अ़ंख़ आमून रख लिया. आख़्नातून ने अपनी बहनों और बेटियों से भी अज़्दवाजी ताअ़ल्लुक़ात उस्तवार किये. तूत अ़ंख़ आमून ने भी अपने बाप आख़्नातून की तरह अपनी सौतेली बहन से शादी की थी.
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| मकातीब-ए अमरना (1887) |
अमरना से दौरान-ए हफ़्र दरयाफ़्त मकातीब-ए सफ़हात-ए ख़ाक से हालात-ए ज़माना-ए फ़िरऔ़न-ए मिस्र आख़्नातून का इल्म हुआ है. बज़ात-ए ख़ुद फ़िरऔ़न-ए मिस्र आख़्नातून ने अपने दरबारियों को अपने वक़्त के दौरान रोनुमा होने वाले हालात ओ वाक़ेआत तहरीर कर लेने का हुक्म दिया था. लिहाज़ा अपने फ़िरऔ़न के हुक्म की बजा आवरी करते हुए वो अक्सर ऐसा ही करते थे. और जब भी कोई ग़ैर माअ़्मूली वाक़ेआ मरदम-ए मिस्र को दरपेश होता, इन्हीं सफ़हात-ए ख़ाक पर तहरीर किया जाता था.
आख़्नातून के ज़माने के हालात उसके दारुल हुकूमत शहर अख़्तातून से दरयाफ़्त मकातीब-ए अमरना नामी तख़्तियों से माअ़्लूम हुए. ना तो उसके ज़माने में किसी क़हत का तज़किरा दरयाफ़्त हुआ है और ना ही इससे निजाअ़्त के कोई इकदाम का जो कि हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम के ज़माने में आया था. तूत अ़ंख़ आमून की मूमिया की DNA अख़्तबारत के ज़रिये दरयाफ़्त हुआ कि आख़्नातून ने अपनी छोटी बहन से शादी की थी और इन दोनों की शादी के नतीजे में तूत अ़ंख़ आमून की पैदाइश हुई मकातीब-ए अमरना में आख़्नातून से उसकी दो बेटियों और सगी बहन कीया की शादी का भी तज़किरा तहरीर है.
आ़क़बत -
Hz. Yousuf Alayhissalam All Episodes.
इसके कातिब अल जलाल और मुतर्जिम (हिंदी ज़बान में) सुलैमान मुहम्मद ज़ुलक़रनैन हैं. ये मुकम्मल सीरीज़ सहाबी-ए रसूल, हिब्र अल उम्माह, हज़रत अ़ब्दुल्लाह इब्न अ़ब्बास और हज़रत इमाम-ए ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अ़लैह की तफ़ासीर और कुतूब से ली गयी है .
मुसन्निफ़ - ज़ुलक़रनैन अरसलान
नाशिर व मुतर्जिम - ज़ुल. मुहम्मद सुलैमान




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