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क़सस अल अन्बिया: हज़रत दानयाल علیہ السلام - क़िस्त नं. 3 | Daniel - Prophet Danyal |

हज़रत दानयाल और शाह-ए बाबुल

क़सस अल अन्बिया: हज़रत दानयाल عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ -

शुरू ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल के बा-बरकत नाम से जो बातिन ओ ज़ाहिर से ख़ूब वाक़िफ़ है -

दुरूद-ए ख़ुदावन्द बर तमाम मुअ़ज़्ज़िज़ क़ारईन. अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आ़लम आप मुअ़ज़्ज़िज़ीन को अज़ तह क़ल्ब अस्सलामु अ़लैकुम व ख़ुश आमदीद. मैं आप का मेज़बान, ज़ुलक़रनैन मुहम्मद सुलैमान और आप इस वक़्त मौजूद है, निज़ाम-ए आ़लम पर. क़ब्ल अज़ मुतालआ़ एक दफ़ा तिलावत-ए दुरूद बर ख़ातिम-ए अन्बिया ﷺ पेश करें कि ख़ुदावन्द-ए सुब्हान क़ारी पर 10 मर्तबा अपनी रहमतों का नुज़ूल फ़रमाता है -

بِسْمِ ٱللَّٰهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَـٰٓئِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ صَلُّواْ عَلَيْهِ وَسَلِّمُواْ تَسْلِيمًا

दुरूद व सलाम बर नबी-ए ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल, जनाब-ए दानयाल عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ‎ -

(आया आप ने ये सीरीज़ ख़्वान्दन फ़रमाईं -)

ख़ुलासा -

क़ारईन-ए गरामी गुज़िश्ता क़िस्त-ए दोम में हज़रत दानयाल علیہ السلام और नबु ख़ज़नस्र के ख़्वाब और उस के ख़्वाब की तअ़्बीर के वाक़ेआ़त पर मुस्तक़िर थी और आज आप मुअ़ज़्ज़िज़ीन को उस से आगे के हवादिस से आशना कराया जायगा. 

7 अक्तूबर 562 क़ब्ल अज़ मसीह में 80 साला उम्र में नबु ख़ज़ नस्र फ़ौत हो गया उस के बाद उस का फ़रज़न्द बलशासर तख़्त-ए बाबुल पर जलवा अफ़रोज़ हुआ. एक रोज़ उसने तारीख़ी में एक हाथ देखा जिस ने दीवार पर अन्जान अल्फ़ाज़ों में कुछ लिख दिया मगर वो पढ़ ना सका लिहाज़ा उस ने सब से पूछा मगर इस का राज़ कोई ना बता सका. मलका-ए बाबुल ने उस से कहा कि मैं एक ऐसे शख़्स को जानती हूँ.

जो इस की वज़ाहत कर सकता है. लिहाज़ा हज़रत दानियाल बलशासर के हुज़ूर तशरीफ़ लाये. बादशाह ने आप से अर्ज़ किया कि आप जिस भी चीज़ की ख़्वाहिश करेंगे मैं वो आप को फ़राहम करूंगा बशर्ते कि आप मुझ से इस तारीख़ हाथ का राज़ बयान करें. आप ने जवाबन फ़रमाया कि मुझे तुम से किसी चीज़ की तलब नहीं मगर में तुम्हें कुछ याद दिलाना चाहता हूँ कि तुम्हारे वालिद को अल्लाह पाक ने अ़ज़ीम ओ शान मुमलिकत अ़ता की.

वो बिलआख़िर वो अपनी मरदम से सिला रहमी से पेश आने लगा था. वो कुछ पर रहम करता था और कुछ को क़त्ल कर देता था. बेशक उस ने भी लोगों के दिलों में ख़ौफ़ ओ हरास पैदा किया. मगर उसने बहुत से कार-ए ख़ूब भी किये मगर तुम तो सब कुछ फ़रामोश कर बैठे हो यरूशलम से लाये गए जाम-ए मुक़द्दस में शराब पीते हो. सरे आ़म बुतपरस्ती करते हो, जो न कुछ बोलने या सुनने के क़ाबिल हैं. 

तुम ख़ुद को अ़ज़मत वाला जानते हो और उस से ग़ाफ़िल हो जो ख़ालिक़-ए हक़ीक़ी है. अस्ल में वोही तो लायक़-ए परस्तिश है. और वो ही बड़ी शान और अ़ज़मत वाला है. यही तो वजह है कि उस ख़ालिक़-ए यक्ता ने तुम्हें अपनी निशानी के तौर पर ये हाथ दिखाया है. और ये हाथ इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि अब जल्द ही तुम्हारा दौर-ए हुकूमत इख़्तताम पज़ीर हो जायगा.

लिहाज़ा बादशाह बलशासर इस हादसे के चंद ही रोज़ बाअ़्द क़त्ल कर दिया गया. बलशासर के बाअ़्द हकूमत-ए बाबुल दारयूश अव्वल के हाथों में चली गयी. उस ने अपनी हुकूमत के मुख़्तलिफ़ हिस्सों पर 120 फ़रमानदार और तीन वज़ीर मुक़र्रर किये. उन तीन वुज़रा में एक हज़रत दानियाल भी थे. चूंकि आप बनी इसराईल से होकर इतने आअ़्ला ओहदे पर फ़ाइज़ थे लिहाज़ा उमरा के दिलों में आप से हसद पैदा हो गया लिहाज़ा हर वक़्त ये आप में ख़ामियां तलाश करते.

कि किसी तरह करके आप को ओहदा-ए वज़ीर से बरतरफ़ काया जाये लिहाज़ा इन सब ने मिलकर शाह दारयूश की इजाज़त से एक नया क़ानून निकाला. जो ये था कि आइंदा तीस रोज़ तक कोई भी कोई भी शख़्स बग़ैर बादशाह से इजाज़त लिए अपने ख़ुदा से रुजूअ़् नहीं करेगा बसूरत-ए दीगर उसे शेरों की ग़िज़ा बना दिया जायगा. आप का रोज़ का ये मामूल था कि आप रोज़ में तीन दफ़ा बैतूल मुक़द्दस की जानिब मुँह करके अल्लाह पाक की इबादत करते थे. 

एक रोज़ वुज़रा ने आप को इबादत में पाया तो बादशाह दारयूश से शिकायत कर दी. और कहा कि दानयाल ने आप से बग़ैर इजाज़त लिए अपने ख़ुदा की अ़बादत की, हम इस के शाहिद है. लिहाज़ा आप को इस तोहमत की बिना पर शेरों के साथ ज़िन्दान में क़ैद कर दिया गया. उस वक़्त आप की उम्र मुबारक 70 साल हो चुकी थी. बादशाह दारयूश अव्वल रात भर सो ना सका. 

सुबह को अपने सिपाहियों से आप का हाल तलब किया कि जाकर माअ़्लूम करो कि दानयाल के साथ क्या हुआ? बाज़ मुफ़स्सिरीन ने लिखा है कि हज़रत दानियाल 5 रोज़ तक शेरों के साथ ज़िन्दान में क़ैद रहे फिर ख़ुद भागा चला आया और आप को पुकारने लगा, आया आप के ख़ुदा ने आप की हिफ़ाज़त की या नहीं? आप ने फ़रमाया कि क्या तुम नहीं जानते जानवरों पर अन्बिया का गोश्त हराम कर दिया गया है. 

आओ और देखो कि शेर मेरे क़दमों में पड़े हैं. बेशक ये मेरे रब का करम है. दारयूश ने फ़ौरन ज़िन्दान से आप को बाहर निकाला तो आप को बिल्कुल सहीह सलामत पाया. दारयूश अव्वल ने ग़ुस्से में आकर तमाम उमरा और वुज़रा को उनके अहले ख़ाना समेत ज़िन्दान में क़ैद कर देने का हुक्म सादिर कर दिया. 

इस वाक़िये को मशहूर मुफ़स्सिर और मुहद्दिस इब्न अबि अल दुनया ने भी बयान किया है. उन्होंने ये वाक़िआ़ हज़रत अ़ली अल मुरतज़ा की रिवायत से लिया है.

हज़रत दानयाल का विसाल फ़ारिस में हुआ. आप ने अल्लाह पाक से दुआ़ की थी कि आप की तद्फ़ीन नबी-ए आख़रीअज़्ज़मां की उम्मत का कोई शख़्स करे. आप ने एक किताब लिखी जिस में आप ने नबी सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम की सीरत व खुलफ़ा-ए राशिदीन का तज़्करा भी तफ़्सील से किया. आप के विसाल के बाअ़्द आप का जसद-ए अनवर हुरमअज़्ज़ान के बैतुल माल में तख़्त पर बिना ढाँपे महफ़ूज़ रख दिया गया.

हज़रत अबु मूसा अल अशअ़री ने जब ईरान के शहर शुश्तर को फ़तह किया तब बहुत सारा माल-ए ग़नीमत हासिल हुआ. शहर-ए शुश्तर में हुरकुस नामी शख़्स ने हज़रत दानयाल के जसद-ए अनवर तक हज़रत अबु मूसा अल अशअ़री की रहनुमाई की जब भी शुश्तर में बारिश ना होती तो अहले शुश्तर आप के जसद-ए अनवर को खुले मैदान में लेकर रख देते तो इस की बरकत से यहाँ बारिश होने लगती. 

आप के सिरहाने एक संदूक़ था जिस में अ़बरानी ज़बान में लिखी एक किताब महफ़ूज़ थी एक घड़ा था जिस में मौजूद चर्बी को मरीज़ बतौर दवा इस्तमाल करते थे. वहाँ 60 अकयास भी मौजूद थे और हर एक में 10 हज़ार दराहिम थे. हर ज़रूरतमंद शख़्स वहाँ से उधार के तौर पर दराहिम ले जाता और वापस ना लौटाने पर किसी संजीदा मर्ज़ में मुब्तला हो जाता. वहाँ से हज़रत अबु मूसा अल अशअ़री को एक अंगूठी भी दरयाफ़्त हुई. हज़रत अल अशअ़री ने तफ़्सीली ख़त लिख कर हज़रत उमर को भिजवाया.

आप ने फ़रमाया कि किताब को मदीनतुल मुनव्वरा भिजवा दें, चर्बी यहां ले आएं, आधे दराहिम ग़ुरबा और फुक़रा में तक़सीम कर दें और अंगूठी आप रख लें. हज़रत दानयाल के जसद-ए अनवर को बेरी के पत्तों और गुलाब के अर्क से ग़ुस्ल देकर इन की नमाज़-ए जनाज़ा पढ़ें. फिर मख़्फ़ियाना तद्फ़ीन कर दें हज़रत उमर की जानिब से जवाबी ख़त मिलते ही आप ने फ़ौरी तौर पर आप के जसद-ए अनवर को बेरी के पत्तों और गुलाब के अर्क से ग़ुस्ल दिया सुफ़ैद क़िब्ती कफ़न दिया. 

हज़रत अबु मूसा अल अशअ़री ने आ की नमाज़-ए जनाज़ा पढ़ाई फिर आप ने 13 क़ब्रें बनाईं और ता शब् तमाम लोगों के चले जाने तक का इंतज़ार किया. फिर हज़रत अनस और हज़रत अबु मूसा अल अशअ़री ने मिलकर आप को एक क़ब्र में दफ़्न करके सारी क़ब्रों को बराबर कर दिया. 

फ़िल-वक़्त आज की माअ़लूमात का हम यहीं इख़्तेताम करते हैं. सिलसिला-ए क़सस अल अन्बिया में हज़रत दानयाल علیہ السلام के हवादिस-ए ज़िन्दगी से मुतअ़्ल्लिक़ ये आख़िरी क़िस्त थी लिहाज़ा क़िस्त क़ादिम, हज़रत दान्याल علیہ السلام की ज़िन्दगी पर मुस्तअ़्मिल होगी जिस की अशाअ़त अज़ जानिब मरदम-ए निज़ाम-ए आलम आज से 6 रोज़ बाअ़्द (तारीख़ - 19/December/2022 की शब 20:00 बजे) होगी. 

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