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क़सस अल अन्बिया: हज़रत दानयाल علیہ السلام - क़िस्त नं. 1 | Daniel - Prophet Danyal |

नबु ख़ज़नस्र ने ख़्वाब में क्या देखा था??

क़सस अल अन्बिया: हज़रत दानयाल عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ -

शुरू ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल के बा-बरकत नाम से जो बातिन ओ ज़ाहिर से ख़ूब वाक़िफ़ है -

दुरूद-ए ख़ुदावन्द बर तमाम मुअ़ज़्ज़िज़ क़ारईन. अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आ़लम आप मुअ़ज़्ज़िज़ीन को अज़ तह क़ल्ब अस्सलामु अ़लैकुम व ख़ुश आमदीद. मैं आप का मेज़बान, ज़ुलक़रनैन मुहम्मद सुलैमान और आप इस वक़्त मौजूद है, निज़ाम-ए आ़लम पर. क़ब्ल अज़ मुतालआ़ एक दफ़ा तिलावत-ए दुरूद बर ख़ातिम-ए अन्बिया ﷺ पेश करें कि ख़ुदावन्द-ए सुब्हान क़ारी पर 10 मर्तबा अपनी रहमतों का नुज़ूल फ़रमाता है -

بِسْمِ ٱللَّٰهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَـٰٓئِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ صَلُّواْ عَلَيْهِ وَسَلِّمُواْ تَسْلِيمًا

दुरूद व सलाम बर नबी-ए ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल, जनाब-ए दानयाल عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ‎ -

मोहतरम मुअ़ज़्ज़िज़ क़ारईन, सिलसिला-ए क़सस अल अन्बिया عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ में गुज़िश्ता क़िस्त हज़रत उज़ैर عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ की ज़िन्दगी पर मुस्तक़िर थी व आज सिलसिला-ए क़सस अल अन्बिया عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ ही में हमारा मौज़ू पयाम्बर-ए ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ जनाब-ए दानयाल عَلَيْهِ ٱلصَّلَاةُ وَٱلسَّلَامُ की ज़िन्दगी के हालात और हवादिस पर मुस्तक़िर है - 

(आया आप ने ये सीरीज़ ख़्वान्दन फ़रमाईं -)

दानयाल आप علیہ السلام का इस्म-ए ज़ाती है. ये अ़बरानी ज़बान का लफ़्ज़ है. इस्म-ए दानयाल दो अल्फ़ाज़ दानी और ईल की जमाअ़् है, जिस का माअ़्ना अल्लाह की जानिब से फ़ैसला करने वाला है. अगरचा आप علیہ السلام की विलादत और विसाल की तारीख़ की ताकीद नहीं हो सकी मगर अक्सर अ़लमा-ए साबक़ा इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं, आप علیہ السلام का ज़माना हज़रत उज़ैर علیہ السلام और हज़रत अरमिया علیہ السلام का ज़माना यकसां है. इस की एक बुनियादी वजह ये है कि जब भी आप علیہ السلام से मुतअ़्ल्लिक़ क़सस बयान होते हैं तो शाह-ए बाबुल नबु ख़ज़नस्र का तज़्करा भी होता है. 

जब नबु ख़ज़नस्र ने क़ुद्स पर हमला करके उसे तहस नहस कर दिया था और लाखों यहूद को ग़ुलाम बनाकर अपने हमराह बाबुल ले आया था. इन क़ैदियों में अल्लाह के दो नबी علیہ السلام भी शामिल थे जो हज़रत उज़ैर علیہ السلام और हज़रत दानयाल علیہ السلام हैं. जबकि हज़रत दानयाल علیہ السلام अभी बच्चे थे और हज़रत उज़ैर علیہ السلام की उम्र उस दौरान 35- 40 साल के दरम्यान थी मगर हज़रत उज़ैर علیہ السلام तो क़ैद-ए नबु ख़ज़नस्र से भागने में कामयाब हो गए थे और आप علیہ السلام से मुतअ़्ल्लिक़ क़िस्सा क़ुरान-ए मुक़द्दस में सूरह अल-बक़रह में तहरीर है कि 40 साला उम्र में आप علیہ السلام की रूह क़ब्ज़ कर ली गयी.

फिर 100 सालों बाद आप علیہ السلام को दोबारा ज़िंदा किया गया और जिस गधे पर सवार होकर आप علیہ السلام अ़र्ज़-ए क़ुद्स तक पहुंचे थे. इन 100 सालों में उस की भी फ़क़त हड्डियां ही बाक़ी रह गयीं थीं मगर ख़ुदावन्द-ए ज़ुल्जलाल ने उसे भी हयात-ए नौ अ़ता की थी. अगरचा क़ुरआन-ए हकीम में हज़रत उज़ैर علیہ السلام के क़िस्से में या फिर किसी दीगर मक़ाम पर आप علیہ السلام का तज़्करा बयान नहीं किया गया है अलबत्ता आप علیہ السلام की हयात-ए मुबारका से मुतअ़्ल्लिक़ क़सस अहादीस में बयान किये गए हैं. एक दफ़ा आप علیہ السلام को शेरों के हमराह किसी कमरे में मुक़फ़्फ़ल कर दिया गया.

मगर वो वक़्त-ए तमाम आप علیہ السلام के क़दमों में बैठे रहे. और आप علیہ السلام को ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचाया. आप علیہ السلام यतीम थे. और आप علیہ السلام को एक औ़रत ने पाला था. एक वक़्त का ज़िक्र है जो आप के नौजवानी से मुतअ़्ल्लिक़ है. ये वाक़ेआ़ नबु ख़ज़नस्र के यरूशलम पर हमले से क़ब्ल का है. आप علیہ السلام की उम्र अभी 17 साल से कम थी. क़द बुलंद था और आप निहायत ही ख़ूबसूरत थे. एक वक़्त शाह-ए ज़माना ने एक ग़लत फ़ैसला सादिर कर दिया था. दरबार-ए शाही में दो क़ाज़ी-ए आअ़्ला मुक़र्रर थे. बादशाह अपने तमामतर उमूर में उन्हीं से मश्वरा लिया करता था. 

दरबार-ए शाही में एक औ़रत की रफ़्त ओ आमद रहती थी, जिसे ख़ुदावन्द-ए मतआ़ल ने अज़ हुस्न-ए ज़ाहिर ओ बातिनी से नवाज़ा था. बादशाह उस औ़रत की पाकीज़गी और दानाई से बेहद मुतासिर था. जहां दूसरी जानिब क़ाज़ीयान-ए शाह उस औ़रत के इश्क़ में गिरफ़्तार हो चुके थे. हत्ता कि उन्होंने इस औ़रत से अपनी ख़्वाहिश का इज़हार किया मगर उस पाकदामन औ़रत ने इन्कार कर दिया. अगरचा उन दोनों ने बहुत इसरार किया मगर बारहां उस पाकदामन औ़रत का जवाब तकज़ीब में होता.

लिहाज़ा उन दोनों ने बादशाह के हुज़ूर में पेश होकर इस औ़रत पर तोहमत तराशी की. बादशाह को अपने क़ाज़ियों पर अँधा ऐतमाद था. लिहाज़ा उस ने हुक्म सादिर कर दिया कि तीन रोज़ के अंदर इस औ़रत को ज़लील ओ ख़ार कर दिया जाए. मगर तीसरे रोज़ उस बादशाह ने अपने राज़दां को बुलाया और इस मामले पर मज़ीद तहक़ीक़ात करने का हुक्म दिया लिहाज़ा तहक़ीक़ की ग़र्ज़ से वो क़स्र-ए शाही से निकला. हत्ता कि उस जगह पहुँच गया जहां चंद बच्चे खेल रहे थे. वो वहाँ खड़ा होकर देखने लगा कि उन में से एक बच्चा अपने दीगर साथियों से कहता है कि मैं बादशाह बनता हूँ. तुम दो मेरे क़ाज़ी हो और तुम एक औ़रत हो और तुम मेरे सिपाही हो.

लिहाज़ा मैं आप के दरम्यान फ़ैसला करूंगा. राज़दां वहाँ रुक कर देखने लगा. बहरहाल जो बच्चा बादशाह बना था. वो और कोई नहीं बल्कि अल्लाह के नबी हज़रत दानयाल علیہ السلام थे. आप علیہ السلام एक बुलंद मक़ाम पर जलवा अफ़रोज़ हुए. आप का जो साथी सिपाही बना था आप علیہ السلام ने उस से कहा कि जाओ और उन क़ाज़ियों को मेरे हुज़ूर पेश करो फिर आप علیہ السلام ने उन से पूछा कि आप दोनों अपना मुद्दा बयान करें. उन्होंने आप علیہ السلام से अर्ज़ किया कि ये औ़रत पाकदामन नहीं है और गुनाह की मुर्तकिब पाई गयी है लिहाज़ा आप علیہ السلام ने फ़ैसला किया कि इस औ़रत को मेरी नज़रों से दूर कर दो. 

और इन क़ाज़ियों को भी ले जाओ फिर आप علیہ السلام ने अपने सिपाही से कहा कि एक क़ाज़ी को मेरे हुज़ूर पेश करो. हत्ता कि जब उसे आप علیہ السلام के हुज़ूर पेश किया गया तो आप علیہ السلام ने उस से तलब किया कि मुझे बताओ उस औ़रत को तुम कब गुनाहगार पाया? क़ाज़ी ने जवाबन कहा कि मैंने फलां रोज़ इसे इस गुनाह में मुब्तिला पाया फिर उस से आप علیہ السلام ने पूछा कि औ़रत के गुनाह में शरीक कौन था? अर्ज़ किया कि फलां शख़्स इस औ़रत के गुनाह में शरीक था. मज़ीद फ़रमाया कि उस औ़रत को तुम ने कहाँ गुनाहगार पाया? 

अर्ज़ किया कि फलां जगह पर मैं इस के गुनाह का शाहिद रहा हूँ. आप علیہ السلام ने अपने सिपाही से फ़रमाया कि इसे मेरी नज़रों से दूर कर दो और दुसरे को पेश करो. आप علیہ السلام ने यही तीन सवालात उस दुसरे क़ाज़ी से भी किये मगर उस के जवाबात उस के साथी से मुख़्तलिफ़ थे. आप علیہ السلام ने अपना हतमी फ़ैसला सादिर किया और कहा कि दोनों क़ाज़ियों को क़त्ल कर दिया जाये और इस पाकदामन औ़रत को रिहा कर दिया जाये. ये तमाम हवादिस बज़ात-ए ख़ुद अपनी आँखों से देख कर बादशाह का वो मुहक़्क़िक़ भागता हुआ क़स्र-ए शाही में हाज़िर हुआ.

उस ने तमाम तर वाक़ेआ़ खोल कर रख दिया. ये वक़्त तुलू-ए ख़ुर्शीद से कुछ देर बाअ़्द का था. लिहाज़ा दोनों क़ाज़ियों को मुख़्तलिफ़ कमरों में ले जाकर यही सवालात तलब किये गये लिहाज़ा बादशाह ने हज़रत दानयाल علیہ السلام की हिकमत अपनाते हुए औ़रत को रिहा कर दिया और अपने क़ाज़ियों को क़त्ल कर दिया. और इसी वजह से तमाम लोग आप علیہ السلام को इस्म-ए दानयाल علیہ السلام से पुकारने लगे यानी अल्लाह की जानिब से फ़ैसला करने वाला.

फ़िल-वक़्त आज की माअ़लूमात का हम यहीं इख़्तेताम करते हैं. सिलसिला-ए क़सस अल अन्बिया में हज़रत दानयाल علیہ السلام के हवादिस-ए ज़िन्दगी से मुतअ़्ल्लिक़ क़िस्त-ए दोम की अशाअ़त अज़ जानिब मरदम-ए निज़ाम-ए आ़लम आज से 6 रोज़ बाअ़्द (तारीख़ - 7/Dec/2022 की शब 20:00 बजे) होगी. 

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