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पयाम्बर-ए इस्लाम ने मुसल्लस बरमूदा के बारे में क्या फ़रमाया?? हक़ीक़त??

मुसल्लस बरमूदा की हक़ीक़त

मज़हबी व साइंसी नुक़्ता नज़र में बरमूदा?? 

अस्सलामु अ़लैकुम, मुअज़्ज़िज़ क़ारईन आज मैं, बिनयामीन इसराईल आप पर मुसल्लस बरमूदा की हक़ीक़त और तमाम इसरार अफ़्शा करने वाला हूँ -

बहर-ए ओक़ियानूस के ग़र्ब और विलायत-ए फ़्लोरिडा के जुनूब शर्क़ी में वाक़य अ़लाक़ा जिसे हम और आप मुसल्लस बरमूडा के नाम से जानते हैं. चूंकि तारीख़ में इस अ़लाक़े में ग़ालिबन चंद ऐसे ग़ैर हल शुदा अ़जीबग़ामिज़ हवादिस रोनुमा होते रहे हैं लिहाज़ा इस ख़ित्ते के बारे में ये बात ख़ास ओ आ़म है कि ये एक शैतानी बहरी मुसल्लस है. साइंसदान इस बात पर अपनी-अपनी मुख़्तलिफ़ आरा रखते हैं. इस ख़ित्ते से गुज़रने वाले अ़ज़ीम तरीन बहरी और हवाई जहाज़ ता-आज कभी अपनी मंज़िल पर नहीं पहुँच पाए. 

ना ही इन जहाज़ों का कोई मलबा मिला है ना ही यहां से किसी जहाज़ की वापसी हुई है लिहाज़ा ये ख़ित्ता उनके लिए ग़ैर हल शुदा मुअ़म्मा बन कर रह गया है. ब-अ़लावा, जुनूब-ए टोक्यो में वाक़य मज़ीद एक और ऐसा ग़ैर माअ़्मूली ख़ित्ता है, जिसे "बहर अल शैतान" के नाम से जाना जाता हैं. यहां इस ख़ित्ते में ऐसी अ़जीब व पुर इसरार सरगर्मियां रोनुमा होना ख़ास बात नहीं. आज, साइंसी व मज़हबी नज़रियात से हम इन शैतानी ख़ित्तों के ऐसे हक़ाइक़ से पर्दा उठाने वाले हैं. जिन के बारे में क़ब्ल अज़ आज आप ने कभी नहीं जाना होगा. 

मुसल्लस बरमूदा की हक़ीक़त साइंसी नुक़्ता नज़र से?? 

अव्वलन, मुसल्लस बरमूडा जानिब-ए ग़र्ब ख़लीज मेक्सिको से जुनूब में जज़ाइर अल रीय्ह और शुमाल से बरमूडा तक फैला हुआ है. इन जज़ाइर में आबाद साकनान की ताअ़्दाद कुल 6500 है, जबकि इस अ़लाक़े के तक़रीबन जज़ाइर ग़ैर मस्कूनी हैं. माज़ी में यहां रोनुमा होने वाले ग़ैर माअ़्मूली अ़जीब ओ ग़ामिज़ हवादिस की वजह से कोई भी इन ख़ित्तों पर आबाद होना पसंद नहीं करता. यही वजह है कि आज कल कोई भी जहाज़ इन ख़ित्तों से आमद ओ रफ़्त की हिमाक़त नहीं करता. मगर फिर भी कई हवाई जहाज़ यहां से कितनी ही बार बख़ैर व आ़फ़ियत गुज़र जाने में कामयाब हो जाते हैं.

माज़ी में रुनुमा होने वाले बरमूदा हवादिस - 

मुसल्लस बरमूडा के बारे में तहरीर शुदा अव्वलन दस्तावेज़ात क्रिस्टोफ़र कोलम्बस की हैं जो 11 अक्टूबर साल 1992 को दरयाफ़्त हुई थीं. इस किताब में कोलम्बस और उसके हमराहान के बहरी सफ़र के बारे में तफ़्सील मौजूद है. इसमें तहरीर है कि कोलम्बस और उसके हमराहान ने एक दफ़ा के बहरी सफ़र के दौरान मख़्सूस बहरी हिस्से पर आग की लपटें देखीं. इनका क़ुत्ब नुमा भी बख़ैर सिम्त का पता नहीं लगा पा रहा था. वहाँ अ़जीब क़िस्म की मक़्नातीसी अम्वाज मौजूद थीं. उन मुसाफ़रों ने ऐसी कई ग़ैर माअ़्मूली सरगर्मियां मुतवज्जह कीं. 

साल 1813 में अमरीकी नायब सदर हारून बर्र की बेटी थिओडोसिया बर्र जब जुनूबी कैरोलीना से जानिब-ए शहर-ए न्यू यॉर्क, उस वक़्त के मशहूर जहाज़ पेट्रियट में सवार होकर अपने वालिदैन से मुलाक़ात के लिए रवाना हुई तो मुसल्लस बरमूडा के क़रीब आते आते इन का जहाज़ ग़ायब हो गया और जिसके बाद ये जहाज़ दोबारा कभी लौटकर नहीं आया. अगरचे इस कश्ती का कप्तान उस वक़्त का सब से माहिर और बेहतरीन कप्तान था. हारून बर्र अपनी तमामतर जुहूद के बावजूद भी अपनी बेटी को सहीह सलामत तलाश कर लाने में नाकाम रहा. 

साल 1850 से लेकर अब तक तक़रीबन 50 बहरी जहाज़ और 20 हवाई जहाज़ ग़ायब हो चुके हैं जिनका अभी तक कोई सुराग़ नहीं मिला और ना ही इनके ग़ायब हो जाने की कोई वाज़ेह वजह का इल्म हो सका है. साल 1945 से हवाई जहाज़ों के ग़ायब होने का सिलसिला शुरू हुआ. इसी हादसे के बिल्कुल 1 साल बाद, साल 1814 में अमेरिका का ही एक Wasp नामी बहरी जहाज़ इस ख़ित्ते तक आकर ग़ायब हो गया. जबकि इस जहाज़ को चलाने वाला भी एक माहिर और बेहतरीन कप्तान था. 

साल 1945 में फ़्लाइट-19 नामी हवाई जहाज़ ने इस ख़ित्ते तक आकर अपना इख़्तियार खो दिया और वहीं से ये हवाई जहाज़ ग़ायब हो गया. उस हवाई जहाज़ में 14 ख़लबानान मौजूद थे और बाद में उसी रोज़ PBM Mariner BuNo 59225 जहाज़ जिसमें 13 ख़लबानान मौजूद थे, उसी फ़्लाइट-19 नामी हवाई जहाज़ की तलाश में निकले थे मगर बद-क़िस्मती से इस मुसल्लस तक आकर उनका हवाई जहाज़ भी लापता हो गया. 3 जुलाई साल 1947 में Douglas C-54 नामी एक हवाई जहाज़ फ्लोरिडा के साहिल से टकराकर तबाह हो गया था

अगरचे उस हवाई जहाज़ के ख़लबान ने मुसल्लस बरमूडा पर आकर अपने हवाई जहाज़ का इख़्तियार खो दिया था. और यहीं से यके पस अज़ दीगरी जहाज़ों के ग़ायब हो जाने के सिलसिला-ए ला-मतनायी का आग़ाज़ हुआ. मुसल्लस बरमूडा में पेश आने वाले हवादिस में सब से ज़्यादा हैरान कुन हादसा तब पेश आया जब मुसल्लस बरमूडा के समंदर पर एक जहाज़ बग़ैर कप्तान और बहरी मुसाफ़रान के तैरता दरयाफ़्त हुआ. उस जहाज़ की मेज़-ए ग़िज़ा-ख़ोरी पर ताज़ा खाना मौजूद था

इसी तरह का एक और हादसा साल 1925 को बरोज़ 29 नवम्बर पेश आया जब S.S. Cotopaxi नामी एक जहाज़ जिसमें कोयले के ज़ख़ाइर मौजूद थे. इस जहाज़ में 32 अफ़राद का एक अ़म्ला था, जुनूबी कैरोलीना से रवाना हुआ हवाना इस की मंज़िल थी. बद-क़िस्मती से ये जहाज़ भी यहां से गुज़रने वाले दीगर जहाज़ों की तरह तरह मुसल्लस बरमूडा तक आकर गर-मसीरी तूफ़ान में फंस गया और फिर अचानक से ग़ायब हो गया. साल्हां गुम गश्ता रहा ये जहाज़ अचानक साल 2016 में मुसल्लस बरमूडा पर तैरता हुआ पाया गया

इस हादसे की सब से ज़्यादा हैरान कुन बात तब सामने आयी जब तहक़ीक़ में पाया गया कि गुज़िश्ता 91 सालों से इस जहाज़ को मुसलसल ग़र्क़ ऐलान किया जाता रहा. जबकि ये अभी तक बग़ैर किसी कप्तान या किसी दीगर शख़्स के सहीह सलामत मौजूद था. साल 1945 ही में फ्लोरिडा से 10 तयारात तरबियती मुहाजरत की ग़र्ज़ से रवाना हुए मगर दौरान-ए वापसी इनमे से 2 तयारात ग़ायब हो गए थे. इसी साल मज़ीद 5 तयारत के अचानक ग़ायब हो जाने की अख़बार सामने आईं

इन तयारात को तलाश करके वापस लाने के लिए एक मज़ीद एक तयारा भेजा गया मगर उसका भी आज तक कोई पता नहीं चला. अमरिकी बहरी नक़्शों में कहीं भी लफ़्ज़ बरमूडा नहीं मिलता. कई साइंसदान इन मानतिक़-ए शैतान की ग़ैर माअ़्मूली सरगर्मियों का इन्कार करते हुए कहते हैं कि समन्दरों में जहाज़ों का ग़र्क़ हो जाना कोई ख़ास बात नहीं जबकि इसके बर-अ़क्स दीगर कई साइंसदान जहाज़ों के मुसल्लस बरमूडा में ग़र्क़ होने की वजह वहाँ मौजूद अम्वाज-ए मग़नातीसी को बताते हैं

यही वजह है कि इस ख़ित्ते के गिर्द क़ुत्ब नुमा तश्ख़ीस-ए इबआ़द मुतलक़ नहीं कर पाते. लिहाज़ा यहीं से आग़ाज़-ए हवादिस होता है. इस अ़लाक़े से उठने वाले ग़ैर माअ़्मूली ज़लज़लों से समंदर में बड़ी बड़ी लहरें उठना शुरू होती हैं. और ये जहाज़ों को अपनी तरफ़ यन्जज़िब करके ग़र्क़ कर देतीं हैं, जिससे समंदर में झटके पैदा होते हैं और यही झटके फ़िज़ाई जहाज़ों को बे-इख़्तियार कर देते हैं लिहाज़ा ये तयारात भी समंदर में जा गिरते हैं

मंगोल ख़ान, कुबलई ने साल 1274 और 1281 में याबान (Japan) पर हमले की नीयत से 40 हज़ार जंगजुओं पर मुस्तअ़्मिल अपना लश्कर रवाना किया. मगर दोनों ही बार इसके जहाज़ समंदर में ही कहीं ग़र्क़ हो गए. इस समंदर का नाम तो "शैतानी समंदर" है मगर इसे "ड्रैगन का समंदर" के नाम से भी जाना जाता है. अगरचे ये मुसल्लस शैतानी, मुसल्लस बरमूडा के मुक़ाबले में ज़्यादा बहस में नहीं है. 

इन दोनों मुसल्लसात पर सदियों से मुनाज़रात होते रहे हैं मगर मुनाज़िरीन की बातें कभी भी आपस में इत्तफ़ाक़ नहीं करती. यक़ीनन बहर ओक़ियानूस के ग़र्ब में वाक़य मुसल्लस बरमूडा और बहर-ए काहिल के मुसल्लस ड्रैगन के दरमयान ऐसे ना क़ाबिल-ए फ़हम शैतानी तअ़्ल्लुक़ात मौजूद हैं, जिस से हम और आप क़ब्ल अज़ आज बेख़बर थे मगर आज आप पर इसकी हकीकत मज़हबी नुक़्ता नज़र से वाज़ेह हो जायगी

मज़हबी नुक़्ता नज़र में मुसल्लस बरमूदा की हक़ीक़त?? 

दजाल और बरमूदा का आपसी तअ़्ल्लुक़?? 

अगर हम इस्लामी नुक़्ता नज़र से इन शैतानी समंदरों के राज़ से पर्दा उठाने की कोशिश करें तो हमें सहाबी-ए रसूल हज़रत तमीम दारी रदिअल्लाहु अ़न्हु से मुतअ़्ल्लिक़ रिवायत मिलती है. आप रदिअल्लाहु अ़न्हु पहले एक नसरानी थे मगर बाद में आप, नबी-ए आख़िरी अज़्ज़मां मां मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम पर ईमान ले आये और मुसलमान हो गए. (सहीह मुस्लिम की हदीस नं. 7028) हज़रत तमीम दारी रदिअल्लाहु अ़न्हु से रिवायत है कि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम ने 1 रोज़ सहाबा को बुलाया.

और कहा, "तमीम दारी ने मुझ से एक ऐसा हादसा बयान किया है, जो मैं ग़ालिबन आप सब से दजाल से मुतअ़्ल्लिक़ बयान किया करता हूँ. तमीम जब लख़म और जुज़ाम क़बाइल के 30 अफ़राद के हमराह बहरी सफर पर निकले. इन का जहाज़ समंदर की बुलंद-तर लहरों के सबब मुसलसल 1 माह तक समंदर में ही चलता रहा. हत्ता कि ग़ुरूब-ए आफ़ताब के दौरान जब ये एक जज़ीरे पर उतरे तो वहाँ उन्हें अ़जीब क़िस्म का एक तर्सनाक जानदार मिला जिस के जिस्म पर क़सरत से बाल थे. ये उस की जिसामत बा-दुरुस्त माअ़्लूम ना कर सके. 

हैरत की बात तो ये है कि वो जानदार कलाम भी किया करता था. तमीम दारी ने उस जानवर से कहा, "लानत हो तुम पर आख़िर तुम क्या चीज़ हो." उस जानवर ने तमीम दारी से जवाबन कहा कि मैं जसासा हूँ. तमीम दारी ने कहा कि जस्सासा से तुम्हारी मुराद क्या है? जवाबन उस जानवर ने कहा कि ऐ लोगों! ख़ानक़ाह में एक शख़्स तुम से मुलाक़ात का बड़ा मुश्ताक़ है. तमीम दारी को उस जानवर के शैतान होने का ख़ौफ़ आया और सोचा कि कहीं ये हमें कुछ नुसान न पहुंचाये लिहाज़ा तमीम दारी भागकर उस ख़ानक़ाह में दाख़िल हुए वहाँ तमीम दारी एक निहायत ही क़द-बुलंद शख़्स से आशना हुए. 

स शख़्स को घुटनों से टख़नों तक और हाथों को गर्दन से लोहे की जंज़ीर में जकड़ा गया था. तमीम दारी ने उस से पूछा कि तुम क्या चीज़ हो? उसने कहा तुम्हें मेरे बारे में जल्द अज़ जल्द इल्म हो जायगा. तुम मुझे बताओ कि तुम कौन हो? तमीम दारी ने कहा, हम अ़रबी हैं. लिहाज़ा उस क़द-बुलंद शख़्स ने तमीम दारी से मज़ीद जानना चाहा तो तमीम दारी ने उस क़द-बुलंद शख़्स को अ़रब से इस जज़ीरे तक के बहरी सफ़र से मुतअ़्ल्लिक़ बयान किया. फिर उस क़द-बुलंद शख़्स ने तमीम दारी से पूछा कि आया बेसान के नख़्लिस्तान में वाक़य बाग़ के दरख़्तान पर फल आते हैं

तमीम दारी ने जवाबन कहा, हाँ उस बाग़ के दरख़्तान हमेशा फलों से लदे होते हैं. मज़ीद उस शख़्स ने तमीम दारी से पूछा, आया बुहैरा तबरिया में पानी बहता है? और आया वहाँ के साकनान बुहैरा तबरिया से अपने खेतों की आबपाशी करते हैं? तमीम दारी ने जवाबन कहा, हाँ बुहैरा तबरिया में मौजूद पानी से ही वहाँ के साकनान अपने खेतों की आबपाशी कर पाते हैं. ये सब वाक़ेआत बयान करते हुए आप सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम ने सहाबा-ए किराम से फ़रमाया, तमीम दारी से उस क़द-बुलंद शख़्स के आख़िरी सवालात मेरे मुतअ़्ल्लिक़ थे

तब तमीम दारी ने उस शख़्स से कहा कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम अ़रब में जलवागर हो चुके हैं. और मक्का से यसरफ़ हिजरत कर चुके हैं. फिर मज़ीद तमीम दारी से उस शख़्स ने सवाल किया, आया नबी-ए आख़िरी अज़्ज़मां ने अहले अ़रब से जंगें कीं? और अहले अ़रब का क्या बना? तमीम दारी ने जवाबन उस शख़्स से कहा कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम अहले अ़रब पर ग़लबा हासिल कर चुके हैं. बिलआख़िर उस शख़्स ने कहा कि अब मैं तुम्हें अपने बारे में बताता हूँ

मैं मसीह हूँ और अनक़रीब मैं यहां से रिहाई पा लूँगा और महज़ 40 रोज़ के अर्से में अर्ज़-ए कुल पर ग़लबा हासिल कर लूँगा. पता चला कि दजाल का ख़रूज इस दुनया में कब का हो चुका है. वो क़ैद में होते हुए भी अपनी शैतानी ताक़तें लोगों पर आज़माता रहता है. और रिहाई पाते ही रूए ज़मीन पर वो अपने हवारियों के हमराह फ़साद बरपा करेगा मगर अभी वो इन्सानी आबादी से अल्हैदा किसी दूर दराज़ अ़लाक़े में क़ैद है. मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम ने ये हादसा बयान करने के बाद तीन दफ़ा अपना अ़सा ज़मीन पर मारते हुए कहा

'ये यसरफ़ है ये यसरफ़ है ये यसरफ़ है, मैं ना कहता था कि दजाल ना बहर-ए शाम में है. ना ही यमन में बल्कि वो तो शर्क़ में है'. अज़ जानिब-ए अ़रब, जानिब-ए शर्क़ यही ऐसे दो ख़ित्ते हैं, जिन्हें अहले ग़र्ब भी शैतानी बहार कहते हैं. अलबत्ता इस्लामी नुक़्ता नज़र के मुताबिक़ दजाल शर्क़ में है. किसी मिस्री मुहक़्क़िक़ ने अपनी किताब मुसल्लस बरमूडा में लिखा है कि पहले दजाल बहर उल काहिल के जज़ाइर में क़ैद था. फिर बाद विसाल-ए नबी-ए करीम मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि व आलिहि व सल्लम इसे जंज़ीरों से आज़ाद कर दिया गया

मगर बस इसे अभी तक रिहाई की इजाज़त नहीं हुई. लिहाज़ा दजाल बह्रल शैतान से लेकर मुसल्लस बरमूडा के दरम्यान मौजूद है. इसी के क़रीब तहज़ीब-ए शैतानी उरूज-ए कमाल को पहुंचेगी.  

आया आप ने ये मक़ाला ख़्वान्दन फ़रमाया  -

हज़रत यूसुफ़ ऑल एपिसोड्स -

(मज़ीद इस तरह की माअ़्लूमात के हुसूल की ग़र्ज़ से निज़ाम-ए आ़लम के साथ अपनी वाबस्तगी और मुहब्बत मुसलसल इसी तरह जारी रखें और बराए निज़ाम-ए आ़लम, इज़हार-ए मुहब्बत करते हुए इस मज़मून की ज़ाइद अज़ ज़ाइद इश्तराक गुज़ारी करें :)  

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