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क़सस अल अनबिया: हज़रत यूसुफ़ علیہ السلام - क़िस्त नं. 3 | Joseph - Prophet Yusuf |

क़सास अल अनबिया - हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़
क़सास अल अनबिया - हज़रत-ए यूसुफ़
क़सास अल अनबिया: पयम्बर-ए ख़ालिक़-ए मतआल हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ -

हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ 3.हिस्सा -

दुरूद ओ सलाम हो तमाम मुअज़्ज़िज़ ज़ायरीन ओ क़ारईन पर, अहले निज़ाम-ए आलम आप मुअज़्ज़िज़ीन को मुहब्बतों भरा अस्सलामु अलैकुम और तहे दिल से ख़ुश आमदीद कहते हैं. मैं आपके साथ ज़ुलक़रनैन मुहम्मद सुलैमान और आप इस वक़्त मौजूद हैं निज़ाम-ए आलम पर. 

आज का हमारा मौज़ू हज़रत-ए यूसुफ़ और उनके भाइयों पर मुसतमिल है इससे क़ब्ल ज़ायरीन ओ क़ारईन से गुज़ारिश है की पढ़ना शुरू करने से क़ब्ल एक-एक मर्तबा दरूद-ए इब्राहीम पढ़ लें एक मर्तबा दुरूद-ए इब्राहीम पढ़ लेने से अल्लाह सुब्हानहु व तआला क़ारी (पढ़ने वाले) पर १० मर्तबा रहमतें नाज़िल करता है-

بسم الله الرحمن الرحيم
  • - اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ،
  • - اللَّهُمَّ بَارِكَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَ ا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ 

दुरूद ओ सलाम बर ख़िताम अल अनबिया ओ मुरसलीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम व दुरूद ओ सलाम बर पयम्बर-ए ख़ालिक़-ए सुबहान हज़रत-ए यूसुफ़-ए नबी: 

फिर आप भी दोबारा यूसुफ़ के कांधे पर अपना सर मुबारक रखकर इतना रोए की पूरी कमीज़ 700 आंसुओं से भीग गई इसके बाद अल्लाह तआला के फ़ैसले पर राज़ी हुए और भाइयों के साथ रवाना कर दिया फिर रुबीन ने अपने कांधे पर बिठाया और जब तक वालिद के सामने रहे ख़ूब उनकी नज़र बरदारी करते रहे मगर जैसे ही वालिद की निगाहों से ओझल हुए, जनाब- ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को रुबीन ने अपने कांधे से उतार दिया.

और कहने लगा अब ख़ुद हमारी तरह पैदल चल अब तेरी फ़रमाबरदारी कब तक करें लिहाज़ा मज़बूरन आप पैदल चलने लगे लेकिन भाइयों से बहुत पीछे रह गए तो आवाज़ दी मुझे भी साथ ले लो उन्होंने लाअनत और मलामत की ज़ुबान से कहा तू ख़ुद हमारे साथ तेज़ी से चल, आप अलैहिस्सलाम की उम्र मुबारक उस वक़्त सिर्फ़ 8-9 साल थी की थी भाइयों ने ये भी नहीं ख़याल किया की आख़िर यूसुफ़ अलैहिस्सलाम अभी बच्चे हैं कैसे वो पैदल भी चल सकेंगे, हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने भाइयों से बहुत ही गुज़ारिश की मगर इस सब के बावजूद उन्होंने आप पर रहम ना किया

जब बहुत थक गए और पांव में छाले पड़ने लगे तो बोले ख़ुदा के लिए ज़रा ठहर जाओ मुझसे अब नहीं चला जाता मेरे तलवों में छाले पड़ गए हैं फिर भी किसी ने जवाब नहीं दिया जब गर्म हवा चलने लगी तो आपको बहुत ज़्यादा प्यास लगी आपने कहा मुझे पानी पिलाओ मैं प्यासा हूं इस पर भी कोई नहीं बोला आख़िर थक कर हार कर बैठ गए और रोने लगे तो उनमें से एक ने पलटकर आपके मुंह पर तमाचा मारा और कहा कब तक हम तेरे नाज़ ओ नख़रे उठाते रहेंगे,

आप अलैहिस्सलाम ने भाइयों की जब यह सख़्ती देखी तो फ़रमाया, आख़िरकार मेरा क्या क़सूर है जो आप मेरे साथ ऐसा सुलूक कर रहे हैं बोले तुझे अपना क़सूर याद नहीं अब तू अपने ख़्वाब वाले चांद-सूरज को मदद के लिए पुकार पुकार उन 11 सितारों को जो तुझे सजदा करते हैं, तेरी मदद को क्यों नहीं आते यह सुनकर आपने शमून से कहा मैं प्यास से परेशान हूं मुझे पानी पिलाओ उसने वह घड़ा जो हज़रत-ए याक़ूब अलैहिस्सलाम ने दूध से भर कर दिया था.

ज़मीन पर बहा दिया और कहा दूर हो जा, अपने सितारों से मांग. ये सुनकर आप अलैहिस्सलाम की भूक प्यास ज़ारी रही और अपने ख़ालिक़ की बारगाह में दुआ करने लगे की या रब मेरी मदद कर फिर आपने अपने भाई रुबीन से कहा तुम मेरे क़रीबी भाई हो मेरे बेचैन और कमज़ोर जिस्म पर और हमारे बाबा पर रहम करो और मुझे पीने के लिए पानी फ़राहम करो, उसने भी ज़ोरदार तमाचा मारा इसके बाद आप बड़े भाई यहूदा के पास गए और कहा तुम आलिम हो तुम तो मुझ पर रहम करो मेरे बचपन और अपने बाबा का कुछ तो ख़याल करो यह सुनकर यहूदा को रहम आ गया और उसने अपने दामन में छुपा लिया और कहा, भाई जब तक मेरी जान बाकी है, तुझ पर किसी को काबू ना दूंगा और तुझे कोई नहीं मार सकता.

जब भाइयों ने यहूदा की जानिब से हिमायत देखी तो बोले अच्छा तो फिर ठीक है तुम ही बताओ हम इसके साथ क्या करें यहूदा ने कहा की जिस तरह इसे बाबा के पास लाये थे उसी तरह उनकी खिदमत में वापस पहुंचा दो और मैं ज़मानत देता हूं कि जो कुछ तुमने इसके साथ बदसलूकी की है, मैं उसे बाबा से बयान नहीं करूंगा, ये सुनकर बोले अच्छा तुम ये चाहते हो की यूसुफ़ बाबा का जानशीन बने फिर हम बाबा की तवज्जोह कैसे हासिल करेंगे सुन लो यहूदा हम तुम्हारी बात हरगिज़ नहीं मानेंगे और अगर ज़रुरत पेश आयी तो हम तेरा क़त्ल करने से भी दरेग़ नहीं करेंगे.

तू जानता है, ये वक़्त हमें बड़ी मुश्किल से मिला है इस पर यहूदा ने कहा यूसुफ़ को मार डालना अच्छा नहीं अगर इसे बाबा से दूर ही करना है तो इसे कुँए में उतार दो, इस पर सब बोले, ठीक है, तुम इसके पास से अलग हो जाओ. यहूदा ने कहा जब तक तुम लोग मुझसे अहद नहीं कर लेते की यूसुफ़ को क़त्ल नही करोगे, मैं नहीं हटूंगा तो उन्होंने क़सम खाई कि हम यूसुफ़ को क़त्ल नहीं करेंगे तब यहूदा ने उठने का इरादा किया इस पर हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने कहा तुम्हें भी उन्होंने बातों में ले लिया, यहूदा ने कहा मैं मज़बूर हूं.

अगर मैंने इनकी बात ना मानी तो ये हम दोनों को यहीं क़त्ल कर देंगे, अगर ये तुम्हें कुँए में डाल दें तो तुम्हारा मुहाफ़िज़ खुद अल्लाह तआला होगा तुम्हें फ़िक़्र करने या डरने की ज़रुरत नहीं. ये सुनकर हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ख़ूब रोये फिर शमून ने हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का हाथ पकड़ा और सेहरा में बहुत दूर एक कुआं मौजूद था जहां आप अलैहिस्सलाम को ले जाया गया, जिसमें डालना तय पाया था. कुँए के पास ले जाकर आपके हाथ पांव बांधे गए आपकी कमर के गिर्द रस्सी बांधकर आपको डोल में बिठाया गया और आपका कुर्ता उतार लिया गया फिर कुएं में लटकाया गया और जब डोल को कुँए की जानिब उतारा गया.

तो फ़ौरन रस्सी काट दी गयी ताकि जल्दी कुएं के नीचे पहुंचे और मर जाए इधर रस्सी काटी गई उधर ख़ुदावंद-ए मेहरबान ने हज़रत-ए जिब्राइल अलैहिस्सलाम से फ़रमाया, ऐ जिब्रील ये सिदरा पे रहने का वक़्त नहीं है फ़ौरन जाओ और मेरे यूसुफ़ को कोई चोट लगने से पहले अपने परों पर बिठा लो, हज़रत-ए जिब्रईल अलैहिस्सलाम फ़ौरन सिदरा से कुँए में तशरीफ़ लाये और हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को अपने परों पर बिठा लिया,

और जो कमीज़ जनाब-ए याक़ूब अलैहिस्सलाम ने अपने लख़्त-ए जिगर को बतौर-ए तावीज़ आपके बाजू पर बाँधा था उसे हज़रत-ए जिब्रील अलैहिस्सलाम ने खोलकर जनाब-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को पहना दिया और कुँए के अंदर रहने वाले जानवरों को मुख़ातिब करते हुए हज़रत-ए जिब्रील अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया, तुम्हारे इस कुँए को तुम्हारे ख़ालिक़-ए सुबहान ने अपने पयम्बर की आमद का शर्फ़ बख़्शा है, इसे कोई भी किसी क़िस्म की तक़लीफ़ ना पहुंचाये, कुआं 70 गज़ गहरा था, बहरहाल हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कुएं में तनहा रहे, आप अलैहिस्सलाम ने सब्र इख़्तियार किया और बारगाह-ए ख़ुदावन्दी में दुआगोह रहे. 

फ़िल-वक़्त आज की माअ़लूमात का हम यहीं इख़्तेताम करते हैं. सिलसिला-ए क़स्सास उल अ़नबिया में हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम के हालात-ए ज़िन्दगी पर मुस्तमिल अगली चौथी क़िस्त जल्द अज़ जानिब- ए "मरदम-ए निज़ाम-ए आलम", शाया कर दी जायगी - इंशा अल्लाह. 

मज़ीद इसी तरह की तारीख़ी और इस्लामी माअलूमात के हुसूल की ग़र्ज़ से "निज़ाम-ए आलम" के साथ अपनी वाबस्तगी जारी रखें और बर-ऐ निज़ाम-ए आलम अपनी मोहब्बत ज़ाहिर करते हुए इस मज़मून की ज़्यादा से ज़्यादा इश्तराक गुज़ारी करें. 
 
शुक्रिया- 

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