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क़सस अल अनबिया: हज़रत यूसुफ़ علیہ السلام - क़िस्त नं. 10 | Joseph - Prophet Yusuf |

क़स्सास उल अनबिया: हज़रत-ए यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम - क़िस्त नं. 10 | Joseph - Prophet Yusuf |
क़स्सास उल अनबिया: हज़रत-ए यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम - क़िस्त नं. 10
क़स्सास उल अनबिया: हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम

शुरू ख़ुदावंद-ए सुब्हान के बा-बरकत नाम से जो दिलों का मालिक है और जो दिलों के राज़ बख़ूबी जानता है-

दुरूद ओ सलाम बर तमाम मुअज़्ज़िज़ क़ारईन ओ ज़ायरीन, अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम आप मुअज़्ज़िज़ीन को मुहब्बतों भरा अस्सलामु अ़लैकुम व ख़ुश आमदीद, मैं आपका मेज़बान ज़ुलक़रनैन मुहम्मद सुलैमान और आप इस वक़्त मेरे साथ मौजूद हैं निज़ाम-ए आलम पर-

बक़ब्ल-ए मुताअला तमाम ज़ायरीन ओ क़ारईन से गुज़ारिश पेश है की आज के इस मज़मून का मुताअला भी मस्ल-ए हमेशा दुरूद-ए इब्रहीम के साथ ही शुरू करें. एक बार दरूद पढ़ लेने से ख़ुदावंद-ए मतआल क़ारी पर 10 मर्तबा अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमाता है-

بسم الله الرحمن الرحيم
  • - اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ،
  • - اللَّهُمَّ بَارِكَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَ ا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ 

दुरूद ओ सलाम बर ख़िताम अल अनबिया ओ मुरसलीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम व दुरूद ओ सलाम बर नबी-ए ख़ुदावंद-ए सुब्हान जनाब-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ (अलैहिस्सलातुवस्सलाम):

हज़रत यूसुफ़ अ़लैहिस्सलाम - क़िस्त नं.10

("शैख़ उल इस्लाम हज़रत-ए इमाम-ए ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं की इंसान अगर गुनाह से बचना चाहे तो दरवाज़े पे ताले भी लगे हों टूट जाते है और ख़ुदावन्द अपने बन्दे को बचा लेता है.")

मगर दोनों के भागने का मंज़र अज़ीज़-ए मिस्र क़ित्तिन ने देख लिया और इससे पहले की हज़रत यूसुफ़ कुछ कहते हज़रत ज़ुलैख़ा कहने लगीं, वाय हो हम पर, देख रहे हैं आप, हमारी मोहब्बतों का ये सिला दिया है. कितना बुरा ग़ुलाम है ये?, इसने हमारे साथ ख़यानत की है. जो आपकी बीवी पर बुरी नज़र रखता हो उसकी सजा इसके सिवाय और क्या हो सकती है की उसे क़ैद कर दिया जाये.

मगर हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ने क़त्ल की बात नहीं कही. हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ने सोचा क़ैद में रहेंगे मगर रहेंगे तो मेरे ही पास. शैख़ उल इस्लाम हज़रत इमाम-ए ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं की अज़ीज़-ए मिस्र हज़रत-ए ज़ुलैख़ा से कहता है की जब तुम्हारी इज़्ज़त पर हाथ डाला है तो क़ैद क्यों क़त्ल की बात क्यों नहीं करती हो? हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ख़ामोश होकर नज़रें झुका लेती हैं फिर अज़ीज़-ए मिस्र हज़रत-ए यूसुफ़ से कहता है की मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी, नहीं पता था की तुम इस क़दर की गिरी हुई हरकत करोगे. 

मैंने तो तुम्हें अपना बेटा समझा मगर तुमने ये दिन दिखाया. हज़रत-ए यूसुफ़ फ़रमाने लगे की मुक़स्सिर मैं नहीं, ये ज़ुलैख़ा थीं जिन्होंने मुझे अपनी तरफ़ माइल करना चाहा. अज़ीज़-ए मिस्र हज़रत-ए ज़ुलैख़ा से कहता है की ज़ुलैख़ा तुम बेक़सूर हो, क्या तुम्हारे पास इसका कोई सबूत है? हज़रत-ए ज़ुलैख़ा कहतीं हैं नहीं हम दोनों ही हरम में तनहा थे. हज़रत-ए यूसुफ़ फ़रमाने लगे मैं बेक़सूर हूँ, मेरे पास अपने बेगुनाह होने का शाहिद है. बादशाह कहता है, कौन है तुम्हारा शाहिद? 

अभी और इसी वक़्त पेश करो की तुम्हारे हक़ में हाज़िर होकर शहादत दे. दर हक़ीक़त मलिका-ए मिस्र के हुजरे में बादशाह-ए मिस्र क़ित्तीन की बेटी आसनात का फ़रज़न्द अपने गहवारे में सो रहा था, जिसकी पैदाइश को अभी सिर्फ़ 40 रोज़ ही गुज़रे थे. आसनात अज़ीज़-ए मिस्र की बेटी थी, जो उसकी पहली बीवी से थी. आसनात अज़ीज़-ए मिस्र की वाहिद औलाद थी. 


बहरहाल - बादशाह कहने लगा, क्या तुम मेरा मज़ाक बना रहे हो?, एक नौज़ाएदा बच्चा, भला कैसे बोल सकता है? हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं, अगर ख़ुदावंद-ए सुब्हान का हुक़्म हुआ तो ज़रूर वो बच्चा मेरे हक़ में शहादत देगा. अभी ये सब बातें चल ही रहीं थीं की इसी दौरान बच्चा बोल उठा. उस बच्चे ने कहा, ब-हुक़्म-ए इलाही, उसका कलाम बयान करता हूँ, अगर यूसुफ़ علیہ السلام का क़मीज़ आगे से फटा है तो यूसुफ़ علیہ السلام मुक़स्सिर और मलिका बेगुनाह है लेकिन अगर क़मीज़ पीछे से फटा हो तो ज़ुलैख़ा मुक़स्सिर और यूसुफ़ علیہ السلام बेगुनाह है.

जब यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को ख़ुदावंद-ए करीम ने बादशाहत से नवाज़ा तो आपने ऐलान करवाया की ये वही बच्चा है जिसने मेरी पाक दामनी की शहादत दी थी, सब इसके मुक़ाबिल तअज़ीमन झुका करें. 

बादशाह-ए मिस्र क़ित्तिन जब देखता है की हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का क़मीज़ पीछे से फटा है, मलिका-ए ज़ुलैख़ा से कहता है की तुम मुझे अपने आंसुओं से फ़रेब देना चाहतीं थीं. दर हक़ीक़त तो तुमने मेरे साथ ख़यानत की है. फिर बादशाह-ए मिस्र, हज़रत यूसुफ़ से मुआफ़ी तलब करता है और कहता है की इस मआमले को यहीं ख़त्म कर दो और भूल जाओ आज के इस वाक़िये को. बस तीन लोगों के अंदर ही ये मुआमला निबटा दिया जाता है मगर क़स्र की कुछ ख़ादिमाएँ इस वाक़िये को सुन लेती हैं.

और कुछ दिनों बाद सारे मिस्र में ये बात आम हो जाती है. हर कजा सिर्फ़ मलिका-ए मिस्र और हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के क़स्सास की बहस होने लगती है हत्ता की ये बात मलिका-ए मिस्र की सहेलियों तक पहुँच जाती हैं. उनमे बहस होने लगती है, सुना है, मलिका ज़ुलैख़ा अपने ही इबरानी ग़ुलाम से मोहब्बत करने लगी है जबकि अभी वो बच्चा है. 

महज़ 17 साल उसकी उम्र है. मलिका-ए मिस्र की क़रीबी सहेलियां उनसे कहतीं हैं, क्या तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है? जो मोहब्बत कर बैठी हो वो भी एक इबरानी ग़ुलाम बच्चे से जो उम्र में तुम्हारे बराबर भी नहीं है, वो तुम्हारे बेटे जैसा है. मोहब्बत की भी कोई इन्तेहां है मगर तुम तो अपनी तमाम हुदूद पार कर गयी हो. मलिका-ए मिस्र उनके ताने बानों से तंग आकर अपनी उन सहेलियों को दावत देती हैं. 

मलिका ने बेहतरीन क़िस्म के खाने और अपनी सहेलियों के लिए तमाम तर असाइश का अहतमाम किया और जनाब-ए यूसुफ़ علیہ السلام को बड़ा खूबसूरत लिबास ज़ेब-ए तन किया. यूं बेहतरीन तौर पर आप अलैहिस्सलाम को आरास्ता किया गया और आख़िर में चेहरे पर नक़ाब डाल दिया गया फिर मलिका-ए मिस्र ने हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से कहा की जब मैं इशारा कर दूँ तो महफ़िल में दाख़िल होना.

मलिका-ए मिस्र ने अपनी सहेलियों की ताअदाद के मुताबिक़ निहायत ही तेज़धार चाक़ू और नारंज का अहतमाम किया और जब तमाम सहेलियां महफ़िल में हाज़िर हो चुकीं तो अपनी हर एक सहेली को एक नारंज के साथ एक चाक़ू तक़सीम करवा दिया और फिर मलिका ने कहा की जब मैं इशारा करूँ तो नारंज छीलना शुरूअ करियेगा. बिलआख़िर मलिका ने तमाम सहेलियों से नारंज तनावुल करने का कहा.

और जब उन्होंने नारंज छीलने शुरू किये तो मलिका ज़ुलैख़ा ने हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को अंदर आने के लिए आवाज़ दी और जैसे ही हज़रत-ए सय्यदना यूसुफ़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम महफ़िल में दाख़िल हुए. तो आप अलैहिस्सलाम के हुस्न ओ जमाल को देखकर तमाम ज़नान-ए मिस्र ने सिवाय मलिका ज़ुलैख़ा के बजाय नारंज पर चलाने के उँगलियों पर चाक़ू चला डाला और अपनी उंगलियां ही काट डालीं.

तमाम ज़नान-ए मिस्र, बेहोशी में चीख़ उठीं की ये बशर नहीं है, ये तो कोई फ़रिश्ता है. मगर उन्हें अपनी उंगलियां कट जाने का अहसास तक ना हुआ, हत्ता की हज़रत-ए यूसुफ़ के जमाल को देखकर तड़प उठीं. हज़रत-ए ज़ुलैख़ा ने आप अलैहिस्सलाम से फ़रमाया की फ़ौरन नक़ाबपोश हो जाओ उस दिन के बाद जनाब-ए ज़ुलैख़ा से दीग़र ज़नान-ए मिस्र ने माज़रत की और फिर कभी उनको ताना देना ही भूल गयीं. 

मगर हर गुज़रते दिन के साथ हज़रत-ए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के लिए हज़रत-ए ज़ुलैख़ा की मोहब्बत मज़ीद बढ़ती जाती. हज़रत-ए ज़ुलैख़ा पर नफ़्सानियत का इतना ग़लबा था की उन्होंने फिर दोबारा एक रोज़ हज़रत-ए यूसुफ़ को अपने पास बुलाया और कहा की मैंने अपना इज़्ज़त ओ वक़ार सब खो दिया है, सिर्फ़ तुम्हें हासिल करने के लिए और अब मैं दस्तबरदार होने वाली नहीं हूँ.

फ़िल-वक़्त आज की माअ़लूमात का हम यहीं इख़्तेताम करते हैं. सिलसिला-ए क़स्सास उल अ़नबिया में हज़रत-ए यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम के हालात-ए ज़िन्दगी पर मुस्तमिल अगली 11th क़िस्त जल्द अज़ जानिब- ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम शाया कर दी जायगी - इंशा अल्लाह. 

मज़ीद इसी तरह की तारीख़ी और इस्लामी माअलूमात के हुसूल की ग़र्ज़ से निज़ाम-ए आलम के साथ अपनी वाबस्तगी जारी रखें और बर-ऐ निज़ाम-ए आलम अपनी मोहब्बत ज़ाहिर करते हुए इस मज़मून की ज़्यादा से ज़्यादा इश्तराक गुज़ारी करें. 

शुक्रिया-

✍️- Jalal Ibn Teymous - Egyptian Scholar & Historian
Translator & Publisher - Zulqarnayn Sulayman

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