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क़सस अल अनबिया: - हज़रत ख़िज़्र علیہ السلام | Khizr - Prophet Khidhr |

वाक़ेआ ए सफ़र ए मज्म उल बहरैन- हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम की हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात-

सफ़र-ए मज्म-ए बहरैन

तारीख़ ओ तआरूफ़-ए हज़रत-ए ख़िज़्र अलैहिस्सलाम, पैग़म्बर-ए ख़ुदावंद-ए यकता.

क़स्सास उल अनबिया: हज़रत ख़िज़्र अ़लैहिस्सलाम

शुरू ख़ुदावंद-ए सुब्हान के बा-बरकत नाम से जो दिलों का मालिक है और जो दिलों के राज़ बख़ूबी जानता है-

दुरूद ओ सलाम बर तमाम मुअज़्ज़िज़ क़ारईन ओ ज़ायरीन, अज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम आप मुअज़्ज़िज़ीन को मुहब्बतों भरा अस्सलामु अ़लैकुम व ख़ुश आमदीद, मैं आपका मेज़बान एरख़ान अहमद अल मुजाहिद और आप इस वक़्त मेरे हमराह मौजूद हैं, निज़ाम-ए आलम पर.

बक़ब्ल-ए मुताअला तमाम ज़ायरीन ओ क़ारईन से गुज़ारिश पेश है की आज के इस मज़मून का मुताअला भी मस्ल-ए हमेशा दुरूद-ए इब्रहीम के हमराह ही शुरू करें. एक बार दरूद पढ़ लेने से ख़ुदावंद-ए मतआल क़ारी पर 10 मर्तबा अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमाता है-

بسم الله الرحمن الرحيم
  • - اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ،
  • - اللَّهُمَّ بَارِكَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَ ا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ 

दुरूद ओ सलाम बर ख़िताम अल अनबिया ओ मुरसलीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम व नबी-ए ख़ुदावंद-ए मतआल जनाब-ए ख़िज़्र (अ़लैहिस्सलातुवस्सलाम):

हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम कौन हैं? 

हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम के वालिद का नाम हज़रते मल्कान है आपका असल नाम बलिया है आपका लक़ब अबुल अब्बास है, मुख़तलिफ़ किताबात में आपको अलक़ाब-ए ख़ज़र, खज़िर और ख़िज़्र से मुखातिब किया गया है, नाम- ए ख़िज़्र के माने सब्ज़ है, इन्हे लक़ब-ए ख़िज़्र से मुखातिब करने का सबब ये है की आप जहां भी जाते हैं, जहां भी पैर रखते हैं, जहां भी बैठते हैं वहां हरयाली छा जाया करती हैं. 

बलिया सरयानी ज़ुबान का लफ्ज़ है. ज़ुबाने अरबी में बलिया नाम के माने अहमद है. बाज़ उलमा के मुताबिक़ आप अलैहिस्सलाम हज़रते ज़ुलक़रनैन अलैहिस्सलाम के खालाज़ाद भाई हैं, हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हज़रते ज़ुलक़रनैन अलैहिस्सलाम की अलमबरदार रहे हैं. मुख़तलिफ़ उलमा-ए दीन और बुज़ुर्गवार का कहना है की हर वो शख्स जो हज़रते ख़िज़्र का नाम हज़रते ख़िज़्र के वालिद का नाम और हज़रते ख़िज़्र की कुनियत (लक़ब) याद रखेगा उसका खात्मा ईमान पर होगा.

हमारी मालूमात के मुताबिक़ हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम का दौर हज़रते यूसुफ़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम की पैदाइश से 1200 साल पहले का है इस बात पर भी उलमा मुत्तफीक़ हैं, अगरचे ज़्यादातर उलमा आपका दौर-ए हयात हज़रते हुद अलैहिस्सलातु वस्सलाम के दौर-ए हयात के क़रीब बताते हैं आप अलैहिस्सलाम हज़रते नूह अलैहिस्सलाम के फ़रज़न्द साम की औलाद से हैं.   

जब हज का मौसम आता है तो आप बकरियों और दीग़र जानवरो की तिजारत की ग़र्ज़ से जानिब- ए हिजाज़ तशरीफ़ ले जाते हैं और अपने गुज़ारे के लिए साल भर की कमाई कर लिया करते हैं. अक्सर आप दरियाओं और समन्दरों के पास हुआ करते हैं और मुख्तलिफ बुज़ुर्गों से आपकी मुलाक़ात होती ही रहती है. 

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क्या हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम एक नबी थे?

इस बात में कोई शक़ नहीं कि आप अलय्हिस्सलाम अल्लाह तआला के पैग़म्बर हैं. मुख़तलिफ़ तारीख़ी क़िताबात में मुअर्रिख़ीन और उलमा-ए दीन-ए इस्लाम ने लिखा है की हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम अल्लाह सुब्हानहु व तआला के 1,24,000 अन्बिया में से ही एक नबी थे. मुअर्रिख़ीन जलाल अल दीन अल महल्ली और अल सुयूती अपनी किताब तफ़्सीर अल जलालैन में लिखते है इस बात में कोई शक़ नहीं कि हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम खुदावंद के 1,24,000 अनबिया ओ किराम में से ही एक पैग़म्बर थे.    

क्या हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम अभी भी ज़िंदा हैं? 

हाँ हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम अभी भी ज़िंदा हैं और ताक़यामत ज़िंदा रहेंगे. एक मर्तबा हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने चश्मा- ए आब- ए हयात में ग़ुस्ल फ़रमाया था और उसका पानी भी पीया था आप अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने पयम्बर- ए इस्लाम हज़रते मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़ियारत का शर्फ़ भी पाया है लिहाज़ा आप पयम्बर- ए इस्लाम के सहाबी भी थे.   

An Unknown Man With a Hidden Face Riding On a White Horse
Hidden Faced Man Presented As Hadhrat Khidhr

आब-ए हयात कहाँ मौजूद है?

आब-ए हयात से मुताल्लिक़ उलमा ओ मुअर्रिख़ीन में बहुत इख्तिलाफ़ उठते रहे हैं चूँकि आबे हयात का ज़िक्र ना तो कलामे इलाही में है ना ही किसी सहीह हदीस में लिहाज़ा बाज़ इसे महज़ एक अफ़साना कह चुके हैं अगरचे बाज़ इसे हक़ीक़त तस्लीम करते हैं. अलबत्ता बाज़ उलमा ने आबे हयात का ज़िक्र अपनी तफ़्सीर में हज़रते ज़ुलक़रनैन अलैहिस्सलातु वस्सलाम के पहले सफ़र के सुमरे में कुछ यूं किया है,

की हज़रते ज़ुलक़रनैन अलैहिस्सलाम ने क़दीम क़िताबात में पढ़ा था की साम बिन नूह अलैहिस्सलाम की औलाद में से जो एक शख़्स आबे हयात पी लेगा वो ला-फ़ानी हो जायगा, लिहाज़ा इस ग़र्ज़ से हज़रते ज़ुलक़रनैन ने जानिबे मग़रिब सफ़र किया इस सफ़र में आपके हमराह हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम भी थे यूं हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने तो आबे हयात का ज़ायका चख लिया मगर हज़रते ज़ुलक़रनैन अलैहिस्सलाम आब-ए हयात पीने से क़ासिर ओ महरूम रह गए. 

वाक़ेआ-ए सफ़र-ए मज्म उल बहरैन-

दो पैग़म्बरान-ए ख़ुदावन्द की मुलाक़ात 

हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम की हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात-

जब फिरौन अपने लश्कर समेत दरया-ए नील में ग़र्क़ हो गया और हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम को बनी इसराइल के साथ मिस्र में क़रार नसीब हुआ तो एक रोज़ आप अलैहिस्सलाम का अल्लाह सुब्हानहु व तआला के साथ मुकालमा शुरू हो गया.

इस मुकालमे के दौरान अल्लाह से हज़रते मूसा अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने चंद सवालात तलब फरमाए,जो कुछ इस तरह हैं- 

हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा -
1. या अल्लाह तेरे नज़दीक तेरे बन्दगान में सबसे मुअज़्ज़िज़ बन्दा कौन है?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया-
जो मेरा ज़िक्र कसरत से करता है और मुझे कभी फरामोश नहीं करता.

हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम ने पूछा -
2. सबसे बेहतर फैसला करने वाला कौन है?
अल्लाह ने फ़रमाया- 
जो हक़ बजानिब फैसला करे और कभी भी अपने नफ़्स की पैरवी ना करे.

3. तेरे बन्दगान में सबसे ज़्यादा इल्म कौन रखता है?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया-
जो मुख़्तसर से इल्म पर साबिर ना हो और मज़ीद इल्म ओ उलूम सीखने की ख्वाहिश रखता हो ताकि इस तरह उस तालिबे इल्म को कोई ऐसी नसीहत मिल जाए जो उसके लिए राहे हक़ का रहनुमा साबित हो और उसे हलाकत से महफूज़ रखे.

4. अगर तेरे बन्दगान में मुझसे ज़्यादा अहले इल्म कोई हो तो मुझे उसका पता बता दे-
अल्लाह तआला ने फ़रमाया-
ऐ मूसा, ख़िज़्र तुझसे ज़्यादा इल्म वाला है.

आप अलैहिस्सलाम ने पूछा-
5. मैं उन्हें कहाँ तलाश करूंगा?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया-
बहर उल कहाल पर, चट्टान के क़रीब.

हज़रते मूसा ने पूछा-
6. मैं वहाँ कैसे और किस तरह जा सकूंगा?
अल्लाह तआला ने फ़रमाया-
ऐ मूसा एक टोकरी में एक मछली लेकर सफ़र करो जहां ये मछली गिर जाये वहीं ख़िज़्र से तुम्हारी मुलाक़ात होगी.
 
बाद खात्मा- ए मुकालमा हज़रत मूसा ने अपने खादिम और शागिर्द हज़रत यूशा इब्न नून इब्न इफ्राहीम इब्न हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के साथ मज्म उल बहरैन का सफ़र फ़रमाया. ये सफ़र बहुत तवील था राह ही में हज़रते मूसा क़याम के लिए रुके वहां क़याम के दौरान मछली टोकरी से गिर कर समंदर में कूद गयी. क़ुदरते कमाल से जिस जगह समंदर में मछली गयी थी वहां एक सुराख बन गया. आप अलैहिस्सलाम नींद से बेदार होकर दोबारा जानिबे मंज़िल उठ खड़े हुए,

जब बाद-ए ज़ुहर के खाने का वक़्त हुआ तो आपने अपने शागिर्द हज़रते यूशा बिन नून से मछली तलब फ़रमाई तो उन्होंने कहा जब आप आराम फ़रमा रहे थे तब मछली कूद कर तालाब में चली गयी और मैं आपको इस बात से आगाह करना भूल गया, इस पर हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया हमें तो उसी जगह की तलाश थी, बहरहाल आप अपने क़दमों के निशानात का पीछा करते हुए दोबारा उसी जगह पर पहुँच गए जहां मछली कूद गयी थी और जहां आप अलैहिस्सलाम की हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात होनी थी जब आप वहां तशरीफ़ ले गए तो आपने देखा की चट्टान पर एक बुज़ुर्ग बैठे हुए थे.

आप अलैहिस्सलाम ने उन बुज़ुर्ग के क़रीब जाकर जब उन्हें सलाम अर्ज़ की तो उन बुज़ुर्ग को हैरत हुई की इस ज़मीन पर सलाम करने वाला कहाँ से आ गया उन बुज़ुर्ग ने जवाबे सलाम देते हुए फ़रमाया ऐ मुसाफिर कौन हैं आप? आप अलैहिस्सलाम ने कहा मैं मूसा हूँ बुज़ुर्ग ने कहा, कौन मूसा?, क्या आप बनी इसराइल से हैं? हज़रते मूसा ने फ़रमाया जी हाँ इस पर हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने कहा, ऐ मूसा अल्लाह ने मुझे एक ऐसा इल्म अता किया है जिससे आप बेख़बर हैं, और अल्लाह तआला ने आपको ऐसा इल्म दिया है जिसे मैं नहीं जानता.

हज़रते मूसा ने फ़रमाया ऐ ख़िज़्र क्या आप मुझे अपने इन उलूम से वाक़िफ़ कराएँगे ताकि मुझे भी उनसे कुछ इल्म हासिल हो हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने कहा की बशर्ते आप साबिर रहें और आप मुझसे किसी बात से मुताल्लिक़ कोई सवाल न करें तो ही आप मेरे हमराह चल सकते हैं. हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा इंशा अल्लाह मैं सब्र करूंगा और बेइख्तियार नहीं होऊंगा. शराइत क़ुबूल कर लेने की सूरत में आप अलैहिस्सलाम ने हज़रते मूसा और हज़रते यूशा को अपने हमराह चलने की इजाज़त दे दी. 

आप तीनों हज़रात समंदर के बसाहिल चलने लगे और आपकी नज़र एक कश्ती पर पड़ी कश्ती वालों ने आप तीनों को अपने साथ सवार होने दिया और कश्ती का कोई किराया भी नहीं माँगा. जब आप तीनों कश्ती में सवार हुए तो बैठते ही हज़रते ख़िज़्र ने अपने झोले से कुल्हाड़ी निकाली और कश्ती का तख्ता फाड़कर समंदर में फेंक दिया, ये मंज़र देखकर हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम बेइख्तियार हो गए और हज़रते ख़िज़्र से सवाल करने लगे की क्या आपने कश्ती को इसलिए चीरा की इस पर सवार लोगों को समंदर में डुबो दो, अलबत्ता ये आपने बहुत ही बुरा किया.

हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम फरमाने लगे की क्या मैंने आपसे नहीं कहा था की आप साबिर नही हो सकेंगे, हज़रते मूसा ने कहा मैं माज़रत चाहता हूँ भूल से सवाल कर बैठा था लिहाज़ा आप मेरी भूल को तर्क कर दें फिर आप हज़रात मज़ीद दूर पहुँच गए. हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने एक नाबालिग बच्चे को देखा जो अपने वालिदैन का इकलौता फ़रज़न्द था. हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने उस बच्चे को गला दबाकर उसे मार डाला. 

ये खूनी मंज़र देखकर हज़रते मूसा फिर जज़्बाती हो गए और सख्त लहजे में हज़रते ख़िज़्र से फिर सवाल करने लगे की आपने एक सुथरी जान को एक बेकसी जान के बदले क़त्ल कर डाला, बेशक़ तुमने बहुत बड़ा गुनाह किया है. हज़रते ख़िज़्र ने जवाब में कहा की क्या मैंने आपसे नहीं कहा था की आप मेरी शराइत की ताब ना ला सकेंगे, हज़रते मूसा ने कहा की अच्छा अगर आइंदा में आपसे सवालात करूँ तो आप मेरे साथ न रहिएगा.

आपने फिर चलना शुरू किया और चलते-चलते आप एक गांव पहुँच गए और गांव वालों से खाना तलब किया मगर उस गाँव के किसी भी शख्स ने आप सालेहीन की दावत नहीं की. थोड़ी दूर गाँव में आगे चलने पर आप तीनों ने एक गिरती हुई दीवार को देखा तो हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने उस दीवार को सहारा देकर सीधा कर दिया. हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम पहले से ही गाँव वालों की बद-अख़लाक़ी से परेशान थे ही की हज़रते ख़िज़्र के दीवार सीधा कर देने के वाक़ेआ ने हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम के गुस्से की आग को मज़ीद भड़का दिया. आप अलैहिस्सलाम गुस्से पर काबू ना पा सके और हज़रते ख़िज़्र से कहने लगे की तुम चाहते तो उस पर कुछ मज़दूरी ले सकते थे.

ये सुनकर हज़रते ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने मूसा अलैहिस्सलाम से कह दिया की अब हम दोनों की मुलाक़ात यहीं ख़त्म होती है और अब जिन वाक़ेआत को देखकर आप खुद पर काबू ना पा सके मैं उनका राज़ आपको बता ही देता हूँ, की जो कश्ती मैंने फाड़ डाली वो चंद मिस्कीनों की कश्ती थी जिसके ज़रिये वो मिस्कीन अपना गुज़ारा करते थे, आगे एक ज़ालिम बादशाह रहता था, जो उम्दा कश्तियों को छीन लिया करता था और टूटी हुई बेकार कश्तियों को छोड़ दिया करता था तो मैंने जानबूझकर उस कश्ती को फाड़ डाला ताकि वो ज़ालिम बादशाह उन मिस्कीनों से उनकी कश्ती ना छीन ले.

और जिस लड़के को मैंने क़त्ल कर डाला था, उसके वालिदैन सालेहीन और नेक थे अगरचे ये लड़का पैदाइशी काफिर था चूंकि उसके वालिदैन उससे बेइंतिहा मोहब्बत करते थे और उसकी हर ख्वाहिश पूरी कर दिया करते थे, मुझे खौफ था की कहीं ये बच्चा अपने सालेहीन वालिदैन को कुफ्र में मुक्तिला ना कर दे, तो मैंने उस बच्चे को क़त्ल कर दिया इस तरह उसके वालिदैन कुफ्र-ओ गुमराही से बच गए, अब अगर उसके वालिदैन साबिर रहेंगे तो अल्लाह तआला उन्हें एक बेटी अता करेगा जिसकी शादी एक पयम्बर- ए खुदा से की जाएगी और उसकी औलाद में भी पयम्बर- ए खुदा की पैदाइश होगी,

जो एक उम्मत का रहनुमा होगा और मेरा गिरती हुई दीवार को सीधा कर देने का राज़ ये था की वो दीवार दो यतीम बच्चों की थी जिसके नीचे उन यतीम बच्चों का खज़ाना दफन था. उन दोनों बच्चों का बाप एक नेक और सालेह आदमी था अगर वो दीवार को में गिरने से ना रोकता तो उन यतीम बच्चों के ख़ज़ाने पर गांव वाले क़ाबिज़ हो जाते. लिहाज़ा मेरे परवरदिगार ने चाहा की ये दोनों यतीम बच्चे बड़े होकर अपना खज़ाना निकाल लें, अल्लाह तआला की उन दोनों बच्चों पर करम ओ इनायात हैं लिहाज़ा आप इत्मीनान रखिये की मैंने जो कुछ भी किया अल्लाह तआला के हुक्म से ही किया है.

इन सब वाक़ेआत के बाद आप तीनों अलैहिस्सलाम अपनी-अपनी जानिब मंज़िल की जानिब लौट गए. 

फ़िल-वक़्त आज की माअ़लूमात का हम यहीं इख़्तेताम करते हैं. सिलसिला-ए क़स्सास उल अ़नबिया में हज़रत-ए ख़िज़्र अलैहिस्सलातु वस्सलाम के हालात-ए ज़िन्दगी पर मुस्तक़िर ये अव्वल ओ आख़िरी क़िस्त थी. सिलसिला-ए क़स्सास अल अनबिया में अगला मज़मूम हज़रत इब्रहीम-ए ख़लील अलैहिस्सलातु वस्सलाम की हयात-ए मुबारका के हालात व वाक़ेआत पर मुस्तक़िर होगी, जो इस मज़मून से 14 रोज़ बाद (तारीख़ 22/February/2022 की शब 8:00 बजेअज़ जानिब-ए मरदम-ए निज़ाम-ए आलम शाया कर दी जायगी - इंशा अल्लाह. 

आज से अहले निज़ाम-ए आलम ने सिलसिला-ए क़िस्सास अल अनबिया का आग़ाज़ किया है. इसके बाद अगला मज़मून मुख़्तसरन हज़रत इब्रहीम-ए ख़लील अलैहिस्सलातु वस्सलाम फिर हज़रत लूत अलैहिस्सलातु वस्सलाम फिर हज़रत इस्माईल-ए ज़बीउल्लाह अलैहिस्सलातु वस्सलाम फिर हज़रत-ए याअक़ूब अलैहिस्सलातु वस्सलाम की ज़िन्दगियों के हालात और वाक़िआत पर मुस्तक़िर होगा और फिर हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम की ज़िन्दगी पर हम तफ़्सीली तौर पर गुफ़्तगु करेंगे. 

लिहाज़ा सिलिसिला-ए क़िस्सास अल अनबिया में हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम और हज़रत-ए ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा की ज़िन्दगी पर हम एक अल्हैदा सिलसिला ला रहें हैं और क़ुरआन ओ हदीस की रौशनी में हम आपको हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम की ज़िन्दगी से आशना कराएंगे जिसमें कुल 21 अक़्सात होंगी लिहाज़ा आप मुअज़्ज़िज़ीन निज़ाम-ए आलम से अपनी वाबस्तगी यूं ही जारी रखिएगा. 

आइंदा सिलसिला-ए क़िस्सास अल अनबिया-ए क़िराम अलैहिस्सलातु वस्सलाम निहायत ही दिलचस्प होने वाला है और उनमें सबसे ज़्यादा हज़रत यूसुफ़-ए सिद्दीक़ अलैहिस्सलातु वस्सलाम और मलिका-ए मिस्र हज़रत-ए ज़ुलैख़ा सलामुल्लाह अलैहा की हयात-ए मुबारका के क़िस्सास दिलचस्प होंगे जिसकी आइंदा हर क़िस्त आपको उससे अगली क़िस्त की जानिब राग़िब करेगी - इंशा अल्लाह. 

(मज़ीद इसी तरह की तारीख़ी और इस्लामी माअलूमात के हुसूल की ग़र्ज़ से निज़ाम-ए आलम के साथ अपनी वाबस्तगी और मोहब्बत मुसलसल इसी तरह जारी रखें और बर-ऐ निज़ाम-ए आलम अपनी मोहब्बत ज़ाहिर करते हुए इस मज़मून की ज़्यादा से ज़्यादा इश्तराक गुज़ारी करें.) 

(Note - मोहतरम मुअज़्ज़िज़ीन ओ क़ारईन-ए अहले निज़ाम-ए आलम, मज़ीद अर्ज़ है की ज़ेर-ए मज़मून नख़्श-ए नज़रात में अपनी क़ीमती नज़र का इज़हार करते हुए अपनी ख़्वाहिशात से आगाह कर सकते हैं की हमारा अगला मज़मून किस मौज़ूं पर मुस्तक़िर होना चाहिए?)

शुक्रिया-

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